न चक्षुषा न मनसा न वाचा दूषयेदपि।
न प्रत्यक्षं परोक्षं वा दूषणं व्याहरेत् क्वचित् ॥
वह किसी की निन्दा न तो नेत्रों, न मन और न ही वाणी से करे। न प्रत्यक्ष रूप से और न ही परोक्ष रूप से किसी के बारे में दोषारोपण या निन्दात्मक वचन कहे।
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