न चान्नदोषान् निन्देत न गुणानभिपूजयेत् ।
शय्यासने विविक्ते च नित्यमेवाभिपूजयेत् ॥
वह भोजन के दोषों की निन्दा न करे और न ही उसके गुणों की प्रशंसा करे। वह सदा एकान्त स्थान, शय्या और आसन का आदर करे।
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