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हारीतगीता • अध्याय 1 • श्लोक 16
नित्यतृप्तः सुसन्तुष्टः प्रसन्नवदनेन्द्रियः । विभीर्जप्यपरो मौनी वैराग्यं समुपाश्रितः ॥
वह सदा तृप्त, संतुष्ट और प्रसन्नमुख रहे तथा उसकी इन्द्रियाँ प्रसन्न और संयमित हों। वह निर्भय, जप में तत्पर, मौनशील और वैराग्य का आश्रय लेने वाला हो।
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