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हारीतगीता • अध्याय 1 • श्लोक 19
मध्यस्थ एव तिष्ठेत प्रशंसानिन्दयोः समः । एतत् पवित्रं परमं परिव्राजक आश्रमे ॥
प्रशंसा और निन्दा - दोनों में समान भाव रखकर उदासीन ही रहना चाहिये। संन्यासाश्रम में इस प्रकार का आचरण परम पवित्र माना गया है।
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