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हारीतगीता • अध्याय 1 • श्लोक 10
विधूमे न्यस्तमुसले व्यङ्गारे भुक्तवज्जने । अतीतपात्रसञ्चारे भिक्षां लिप्सेत वै मुनिः ॥
जब घर का धुआँ शांत हो चुका हो, ओखली-मूसल का कार्य समाप्त हो गया हो, अंगारे बुझ चुके हों, घर के लोग भोजन कर चुके हों और भोजन के पात्र हटा दिए गए हों, तब मुनि को भिक्षा की इच्छा करनी चाहिए।
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