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हारीतगीता • अध्याय 1 • श्लोक 15
अनुरोधविरोधाभ्यां समः स्यादचलो ध्रुवः । सुकृतं दुष्कृतं चोभे नानुरुध्येत कर्मणा ॥
लोगों के अनुरोध या विरोध करने पर भी सदा समभाव से रहे, निश्चल एवं स्थिरचित्त हो जाय तथा अपने कर्मों द्वारा पुण्य एवं पाप का अनुसरण न करे।
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