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अध्याय 1 — गर्भ उपनिषद

गर्भ
22 श्लोक • केवल अनुवाद
परमात्मा हम दोनों गुरु शिष्यो का साथ साथ पालन करे। हमारी रक्षा करें। हम साथ साथ अपने विद्याबल का वर्धन करें। हमारा अध्यान किया हुआ ज्ञान तेजस्वी हो। हम दोनों कभी परस्पर द्वेष न करें। हमारे, अधिभौतिक, अधिदैविक तथा आध्यात्मिक तापों (दुख) की शांति हो।
शरीर पंचात्मक, पाँचों में वर्तमान, छः आश्रयों वाला, छः गुणों के योग से युक्त, सात धातुओं (ऊतक) से निर्मित, तीन मलों से दूषित, दो योनियों से युक्त तथा चार प्रकार के आहार से पोषित होता है।
पंचात्मक कैसे है? पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश (इनसे रचा हुआ होने के कारण) शरीर पंचात्मक है। इस शरीर में पृथ्वी क्या है? जल क्या है? तेज क्या है? वायु क्या है? और आकाश क्या है? इस शरीर में जो कठिन तत्त्व है वह पृथ्वी है। जो द्रव है वह जल है। जौ उष्ण है वह तेज है; जो सच्चार करता है, वह वायु है; जो छिद्र है वह आकाश कहलाता है।
इनमें पृथिवी धारण करती है, जल एकत्रित करता है, तेज प्रकाशित करता है, वायु अवयवों को यथास्थान रखता है, आकाश अवकाश प्रदान करता है। इसके अतिरिक्त श्रोत्र शब्द को ग्रहण करने मे, त्वचा स्पर्श करने में, नेत्र रूप ग्रहण करने में, जिह्ना रस का आस्वादन करने में, नासिका सूँघने में, उपस्थ आनन्द लेने में तथा पायु मलोत्सर्ग के कार्यं लगा रहता है। जीव बुद्धि द्वारा ज्ञान प्राप्त करता है, मन के द्वारा सङ्कल्प करता है, वाक्-इन्द्रिय से बोलता है।
शरीर छः आश्रयोवाला कैसे है? इसलिये कि वह मधुर, अम्ल, लवण, तिक्त, कट्‌ और कषाय इन छः रसौ का आस्वादन करता है। षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पञ्चम, धैवत और निषाद - यै सप्त स्वर तथा इष अनिष्ट और प्रणिधानकारक (प्रणवादि) शब्द मिलाकर दस प्रकार के शब्द (स्वर) होते है। शुक्ल, रक्त, कृष्ण, धूप्र, पीत, कपिल ओर पाण्डुर - ये सप्त रूप (रंग) है।
शुक्ल, रक्त, कृष्ण, धूप्र, पीत, कपिल ओर पाण्डुर - ये सप्त रूप (रंग) है। सात धातुओं से निर्मित कैसे है? जब देवदत्त आदि नामक व्यक्ति को द्रव्य आदि भोग्य-विषय जुड़ते हैं, तब उनके परस्पर अनुकूल होने के कारण षट्‌-पदार्थ प्राप्त होते हैं जिनसे रस बनता है। रस से रुधिर, रुधिर से मांस, मांस से मेद, मेद से स्रायु, स्रायु से अस्थि, अस्थि से मज्जा और मज्जा से शुक्र - ये सात धातुएँ उत्पन्न होती हैं। पुरुष के शुक्र और स्त्री के रक्त के संयोग से गर्भ का निर्माण होता है।
ये सब धातुएँ हृदय में रहती हैं, हृदय में अन्तराग्रि उत्पन्न होती है, अग्निस्थान में पित्त, पित्त के स्थान में वायु और वायु से हृदय का निर्माण सृजन-क्रम से होता है।
ऋतु काल मे सम्यक्‌ प्रकार से गर्भाधान होने पर एक रात्रि में शुक्र-शोणित के संयोग से कलल बनता है। सात रात में बुद्बुद बनता है। एक पक्ष में उसका पिण्ड (स्थूल आकार) बनता है। वह एक मास मे कठिन होता है। दो महीनों में वह सिर से युक्त होता है, तीन महीने में पैर बनते हैं।
पश्चात्‌ चौथ महीने गुल्फ (पैर की घुट्ठियाँ, पेट तथा कटि-प्रदेश तैयार हो जाते हैं। पाँचवें महीने पीठ की रीढ़ तैयार होती है। छठे महीने मुख, नासिका, नेत्र और श्रोत्र बन जाते हैं।
सातवें महीने जीव (आत्मा) से युक्त होता है। आठवें महीने सब लक्षणों से पूर्ण हो जाता है।
पिता के शुक्र की अधिकता से पुत्र, माता के रुधिर की अधिकता से पुत्री तथा शुक्र ओर शोणित दोनों के तुल्य होने से नपुंसक संतान उत्पन्न होती है।
व्याकुलचित्त होकर समागम करने से अन्धी, कुबड़ी, खोड़ी तथा बौनी संतान उत्पन्न होती है। परस्पर (प्राण) वायु के संघर्ष से शुक्र दो भागों में बंटकर सूक्ष्म हो जाता है, उससे युग्म (जुड़वाँ) संतान उत्पन्न होती है।
पञ्चभूतात्मक शरीर के समर्थ-स्वस्थ होने पर चेतना में पञ्च ज्ञानेन्द्रियात्मक बुद्धि होती है। उससे गन्ध, रस आदि के ज्ञान होते हैं। वह अविनाशी अक्षर ऊँकार का चिन्तन करता है, तब इस एकाक्षर को जानकर उसी चेतन के शरीर में आठ प्रकृतियाँ (प्रकृति, महत्‌-तत्त्व, अहङ्कार और पाँच तन्मात्राएँ) तथा सोलह विकार (पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच स्थूल भूत तथा मन) होते हैं।
माता का खाया हुआ अन्न एवं पिया हुआ जल नाड़ियों के सूत्रों द्वारा पहुँचाया जाकर गर्भस्थ शिशु के प्राणों को तृप्त करता है। तदनन्तर नवे महीने वह ज्ञानेन्द्रिय आदि सभी लक्षणों से पूर्ण हो जाता है। तब वह पूर्व-जन्म का स्मरण करता है। उसके शुभ-अशुभ कर्म भी उसके सामने आ जाते हैं।
तब जीव सोचने लगता है - मैने सहस्रौ पूर्वजन्मो को देखा, उनमें नाना प्रकार के भोजन किये, नाना प्रकार के नाना योनियौ के स्तनौ का पान किया। मैं बारम्बार उत्पन्न हुआ, मृत्यु को प्राप्त हुआ। अपने परिवार वालों के लिये जो मैंने शुभाशुभ कर्म किये, उनको सोचकर मैं आज यहाँ अकेला दग्ध हो रहा हूँ। उनके भोगों को भोगने वाले तो चले गये, मैं यहाँ दुख के समुद्र में पड़ा कोई उपाय नहीं देख रहा हूँ।
यदि इस योनि से मैं छूट जाऊँगा - इस गर्भ के बाहर निकल गया तो अशुभ कर्मो का नाश करने वाले तथा मुक्तिरूप फल को प्रदान करने वाले महेश्वर के चरणों का आश्रय लूँगा।
यदि मैं योनि से छूट जाऊँगा तो अशुभ कर्मो का नाश करने वाले और मुक्तिरूप फल प्रदान करने वाले भगवान्‌ नारायण की शरण ग्रहण करूगा। यदि मैं योनि से छूट जाऊँगा तो अशुभ कर्मो का नाश करने वाले और मुक्तिरूप फल प्रदान करने वाले सांख्य और योग का अभ्यास करूंगा। यदि मैं इस बार योनि से छूट गया तो मैं ब्रह्म का ध्यान करूगा।
पश्चात्‌ वह योनिद्वार को प्राप्त होकर यौनिरूप यंत्र में दबाया जाकर बड़े कष्ट से जन्म ग्रहण करता है। बाहर निकलते ही वैष्णवी वायु (माया) के स्पर्श से वह अपने पिछले जन्म और मृत्युओं को भूल जाता है ओर शुभाशुभ कर्म भी उसके सामने से हट जाते हैं।
देह-पिण्ड का नाम "शरीर" कैसे होता है? इसलिये कि ज्ञानाग्नि, दर्शनाग्नि तथा जठराग्नि के रूप मे अग्नि इसमें आश्रय लेता है। इनमें जठराग्नि वह है, जो खाये, पिये, चाटे ओर चूसे हुए पदार्थों को पचाता है। दर्शनाग्नि वह है, जो रूपों को दिखलाता है; ज्ञानाग्नि शुभाशुभ कर्मो को सामने खड़ा कर देता है।
अग्नि के शरीर में तीन स्थान होते हैं। आहवनीय अग्नि मुख में रहता है। गार्हपत्य अग्नि उदर में रहता है ओर दक्षिणाग्नि हृदय में रहता है। आत्मा यजमान है, मन ब्रह्मा है, लोभादि पशु हैं, धैर्य और संतोष दीक्षाएँ हैं, ज्ञानेन्द्रियाँ यज्ञ के पात्र हैं, कर्मेन्द्रियाँ हवि (होम करने की सामग्री) हैं, सिर कपाल है, केश दर्भ हैं, मुख अन्तर्वेदिका है, सिर चतुष्कपाल है, पार्श्व की दन्तपङ्कियाँ षोडश कपाल हैं।
एक सौ सात मर्मस्थान हैं, एक सौ अस्सी संधियाँ हैं, एक सौ नौ स्रायु हैं, सात सौ शिराएँ हैं, पाँच सौ मज्जाएँ हैं, तीन सौ साठ अस्थियाँ हैं, साढ़े चार करोड़ रोम हैं, आठ पल हृदय है, बारह पल जिह्वा है, एक प्रस्थ पित्त, एक अधक कफ, एक कुदव शुक्र तथा दो प्रस्थ वसा (चरबी) है; इसके अतिरिक्त शरीरय आहारक परिमाण से मल-मूत्र का परिमाण अनियमित होता है। [1 पल = 45.5 ग्राम; 1 प्रस्थ = 728 ग्राम; 1 अधक = 2,912 ग्राम; 1 कुदव = 182 ग्राम]
यह पिप्पलाद ऋषि के द्वारा प्रकटित मोक्षशास्त्र है, पैप्पलाद मोक्षशास्त्र है।
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