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गर्भ • अध्याय 1 • श्लोक 20
तत्र त्रीणि स्थानानि भवन्ति हदये दक्षिणाग्निरुदरे गार्हपत्यं मुखमाहवनीयमात्मा यजमानौ मनो ब्रह्मा लोभादयः पशवो धृतिर्दीक्षा सन्तोषश्च बुद्धीन्द्रियाणि यज्ञपात्राणि कर्मेन्द्रियाणि हवींषि शिरः कपालं केशा दर्भा मुखमन्तर्वेदिः चतुष्कपालं शिरः षोडश पार्शवदन्तोष्ठटपटलानि।
अग्नि के शरीर में तीन स्थान होते हैं। आहवनीय अग्नि मुख में रहता है। गार्हपत्य अग्नि उदर में रहता है ओर दक्षिणाग्नि हृदय में रहता है। आत्मा यजमान है, मन ब्रह्मा है, लोभादि पशु हैं, धैर्य और संतोष दीक्षाएँ हैं, ज्ञानेन्द्रियाँ यज्ञ के पात्र हैं, कर्मेन्द्रियाँ हवि (होम करने की सामग्री) हैं, सिर कपाल है, केश दर्भ हैं, मुख अन्तर्वेदिका है, सिर चतुष्कपाल है, पार्श्व की दन्तपङ्कियाँ षोडश कपाल हैं।
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