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गर्भ • अध्याय 1 • श्लोक 5
षडाश्रयमिति कस्मात्‌ मधुराग्ललवणतिक्तकट्कषायरसान्विन्दते । षट्जर्षभगान्धारमध्यमपञ्चमधेवतनिषादश्चेति । इष्टानिष्टशब्दसंज्ञाः प्रतिविधाः सप्तविधा भवन्ति ॥
शरीर छः आश्रयोवाला कैसे है? इसलिये कि वह मधुर, अम्ल, लवण, तिक्त, कट्‌ और कषाय इन छः रसौ का आस्वादन करता है। षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पञ्चम, धैवत और निषाद - यै सप्त स्वर तथा इष अनिष्ट और प्रणिधानकारक (प्रणवादि) शब्द मिलाकर दस प्रकार के शब्द (स्वर) होते है। शुक्ल, रक्त, कृष्ण, धूप्र, पीत, कपिल ओर पाण्डुर - ये सप्त रूप (रंग) है।
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