इनमें पृथिवी धारण करती है, जल एकत्रित करता है, तेज प्रकाशित करता है, वायु अवयवों को यथास्थान रखता है, आकाश अवकाश प्रदान करता है। इसके अतिरिक्त श्रोत्र शब्द को ग्रहण करने मे, त्वचा स्पर्श करने में, नेत्र रूप ग्रहण करने में, जिह्ना रस का आस्वादन करने में, नासिका सूँघने में, उपस्थ आनन्द लेने में तथा पायु मलोत्सर्ग के कार्यं लगा रहता है। जीव बुद्धि द्वारा ज्ञान प्राप्त करता है, मन के द्वारा सङ्कल्प करता है, वाक्-इन्द्रिय से बोलता है।
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