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गर्भ • अध्याय 1 • श्लोक 4
तत्र पृथिवी धारणे आप: पिण्डीकरणे तेजः प्रकाशने वायुर्गमने आकाशमवकाशप्रदाने । पृथक् श्रोत्रे शब्दोपलब्धौ त्वक् स्पर्शे चक्षुषी रूपे जिह्वा रसने नासिकाऽऽघ्राणे उपस्थश्चानन्दनेऽपानमुत्सर्गे बुद्ध्या बुद्ध्यति मनसा सङ्कल्पयति वाचा वदति ।
इनमें पृथिवी धारण करती है, जल एकत्रित करता है, तेज प्रकाशित करता है, वायु अवयवों को यथास्थान रखता है, आकाश अवकाश प्रदान करता है। इसके अतिरिक्त श्रोत्र शब्द को ग्रहण करने मे, त्वचा स्पर्श करने में, नेत्र रूप ग्रहण करने में, जिह्ना रस का आस्वादन करने में, नासिका सूँघने में, उपस्थ आनन्द लेने में तथा पायु मलोत्सर्ग के कार्यं लगा रहता है। जीव बुद्धि द्वारा ज्ञान प्राप्त करता है, मन के द्वारा सङ्कल्प करता है, वाक्-इन्द्रिय से बोलता है।
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