पश्चात् वह योनिद्वार को प्राप्त होकर यौनिरूप यंत्र में दबाया जाकर बड़े कष्ट से जन्म ग्रहण करता है। बाहर निकलते ही वैष्णवी वायु (माया) के स्पर्श से वह अपने पिछले जन्म और मृत्युओं को भूल जाता है ओर शुभाशुभ कर्म भी उसके सामने से हट जाते हैं।
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