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गर्भ • अध्याय 1 • श्लोक 18
अथ जन्तुः स्त्रीयोनिशतं योनिद्वारि सम्प्राप्तो यन्त्रेणापीड्यमानो महता दुःखेन जातमात्रस्तु वैष्णवेन वायुना संस्पृश्यते तदा न स्मरति जन्ममरणं नच कर्म शुभाशुभम्‌ ॥
पश्चात्‌ वह योनिद्वार को प्राप्त होकर यौनिरूप यंत्र में दबाया जाकर बड़े कष्ट से जन्म ग्रहण करता है। बाहर निकलते ही वैष्णवी वायु (माया) के स्पर्श से वह अपने पिछले जन्म और मृत्युओं को भूल जाता है ओर शुभाशुभ कर्म भी उसके सामने से हट जाते हैं।
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