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गर्भ • अध्याय 1 • श्लोक 14
अथ मात्राऽशितपीतनादीसूत्रगतेन प्राण आप्यायते । अथ नवमे मासि सर्वलक्षणसम्पूर्णो भवति पूर्वजातीः स्मरति कृताकृतं च कर्म विभाति शुभाशुभ च कर्म विन्दति ॥
माता का खाया हुआ अन्न एवं पिया हुआ जल नाड़ियों के सूत्रों द्वारा पहुँचाया जाकर गर्भस्थ शिशु के प्राणों को तृप्त करता है। तदनन्तर नवे महीने वह ज्ञानेन्द्रिय आदि सभी लक्षणों से पूर्ण हो जाता है। तब वह पूर्व-जन्म का स्मरण करता है। उसके शुभ-अशुभ कर्म भी उसके सामने आ जाते हैं।
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