पञ्चभूतात्मक शरीर के समर्थ-स्वस्थ होने पर चेतना में पञ्च ज्ञानेन्द्रियात्मक बुद्धि होती है। उससे गन्ध, रस आदि के ज्ञान होते हैं। वह अविनाशी अक्षर ऊँकार का चिन्तन करता है, तब इस एकाक्षर को जानकर उसी चेतन के शरीर में आठ प्रकृतियाँ (प्रकृति, महत्-तत्त्व, अहङ्कार और पाँच तन्मात्राएँ) तथा सोलह विकार (पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच स्थूल भूत तथा मन) होते हैं।
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