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गर्भ • अध्याय 1 • श्लोक 3
भवति पञ्चातमकमिति कस्मात्‌ पृथिव्यापस्तेजौवायुराकाशमिति अस्मिन्पच्चात्मके शरीरे। का पृथिवी का आपः किं तेजः को वायुः किमाकाशम्‌ । तत्र यह्कठिन॑ सा प्रथिवी यद्द्रवं ता आपो यदुष्णं तत्तेजो यत्सञ्चरति स वायुः यत्सुषिरं तदाकाशमित्युच्यते ॥
पंचात्मक कैसे है? पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश (इनसे रचा हुआ होने के कारण) शरीर पंचात्मक है। इस शरीर में पृथ्वी क्या है? जल क्या है? तेज क्या है? वायु क्या है? और आकाश क्या है? इस शरीर में जो कठिन तत्त्व है वह पृथ्वी है। जो द्रव है वह जल है। जौ उष्ण है वह तेज है; जो सच्चार करता है, वह वायु है; जो छिद्र है वह आकाश कहलाता है।
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