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गर्भ • अध्याय 1 • श्लोक 6
शुक्लो रक्तः कृष्णो धूप्रः पीतः कपिलः पाण्डुर इति । सप्तधातुमिति कस्मात्‌ यदा देवदत्तस्य द्रव्यादिविषया जायन्ते ॥ परस्परं सौम्यगुणत्वात्‌ षड्विधो रसो रसाच्छोणितं शोणितान्मांसं मांसान्येदो मेदसः स्रावा स्रानौऽस्थीन्यस्थिभ्यो मज्जा मच्जञः शुक्र शुक्रशोणितसंयोगादावर्तते गर्भौ हृदि व्यवस्थां नयति ।
शुक्ल, रक्त, कृष्ण, धूप्र, पीत, कपिल ओर पाण्डुर - ये सप्त रूप (रंग) है। सात धातुओं से निर्मित कैसे है? जब देवदत्त आदि नामक व्यक्ति को द्रव्य आदि भोग्य-विषय जुड़ते हैं, तब उनके परस्पर अनुकूल होने के कारण षट्‌-पदार्थ प्राप्त होते हैं जिनसे रस बनता है। रस से रुधिर, रुधिर से मांस, मांस से मेद, मेद से स्रायु, स्रायु से अस्थि, अस्थि से मज्जा और मज्जा से शुक्र - ये सात धातुएँ उत्पन्न होती हैं। पुरुष के शुक्र और स्त्री के रक्त के संयोग से गर्भ का निर्माण होता है।
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