नानायोनिसहस्राणि दृष्टा चैव ततो मया ।
आहारा विविधा भुक्ताः पीताश्च विविधाः स्तनाः ॥
जातस्यैव मृतस्यैव जन्म चैव पुनः पुनः |
अहि दुःखोदधौ मग्रः न पश्यामि प्रतिक्रियाम् ॥
यन्मया परिजनस्यार्थे कृतं कर्म शुभाशुभम् |
एकाकौ तेन दह्यामि गतास्ते फलभीमगिनः ॥
तब जीव सोचने लगता है - मैने सहस्रौ पूर्वजन्मो को देखा, उनमें नाना प्रकार के भोजन किये, नाना प्रकार के नाना योनियौ के स्तनौ का पान किया। मैं बारम्बार उत्पन्न हुआ, मृत्यु को प्राप्त हुआ। अपने परिवार वालों के लिये जो मैंने शुभाशुभ कर्म किये, उनको सोचकर मैं आज यहाँ अकेला दग्ध हो रहा हूँ। उनके भोगों को भोगने वाले तो चले गये, मैं यहाँ दुख के समुद्र में पड़ा कोई उपाय नहीं देख रहा हूँ।
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