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गर्भ • अध्याय 1 • श्लोक 19
शरीरमिति कस्मात्‌ साक्षादग्रयो हात्र श्रियन्ते ज्ञानाग्निर्दर्शनाग्नि कोष्ठाग्निरिति । तत्र कोष्ठाग्रिनमाशितपीतलेहाचोष्य॑ पचतीति । दर्शनाग्नी रूपादीनां दर्शनं करोति | ज्ञानाग्निः शुभाशुभं च कर्म विन्दति ।
देह-पिण्ड का नाम "शरीर" कैसे होता है? इसलिये कि ज्ञानाग्नि, दर्शनाग्नि तथा जठराग्नि के रूप मे अग्नि इसमें आश्रय लेता है। इनमें जठराग्नि वह है, जो खाये, पिये, चाटे ओर चूसे हुए पदार्थों को पचाता है। दर्शनाग्नि वह है, जो रूपों को दिखलाता है; ज्ञानाग्नि शुभाशुभ कर्मो को सामने खड़ा कर देता है।
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