ये सब धातुएँ हृदय में रहती हैं, हृदय में अन्तराग्रि उत्पन्न होती है, अग्निस्थान में पित्त, पित्त के स्थान में वायु और वायु से हृदय का निर्माण सृजन-क्रम से होता है।
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