मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
गर्भ • अध्याय 1 • श्लोक 7
हृदयेऽन्तराग्निः अग्रिस्थाने पित्तं पित्तस्थाने वायुः वायुस्थाने हृदयं प्राजापत्याक्रमात्‌ ॥
ये सब धातुएँ हृदय में रहती हैं, हृदय में अन्तराग्रि उत्पन्न होती है, अग्निस्थान में पित्त, पित्त के स्थान में वायु और वायु से हृदय का निर्माण सृजन-क्रम से होता है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
गर्भ के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

गर्भ के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें