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अध्याय 4 — चतुर्थ अंक

अभिज्ञानशाकुन्तलम्
20 श्लोक • केवल अनुवाद
(तत्पश्चात्‌ फूल चुनने का अभिनय करती हुयी दोनों सखियाँ प्रवेश करती हैं) अनसुया:-- सखी प्रियंवदा, गन्धर्व (विवाह) विधि से सम्पन्न (विवाह रूप) कल्याण (मङ्गल कार्य) वाली शकुन्तला यद्यपि अपने योग्य पति से सङ्गत हो गयी है (अर्थात्‌ अपने योग्य पति को पा गयी है) । इसलिये मेरा हदय आनन्दित (प्रसन्न) है, तथापि इतनी सी बात विचारणीय है । प्रियंवदा:-- कौन-सी ? अनसूया:-- आज वह राजर्षि (दुष्यन्त) यज्ञ को समाप्त करने के बाद ऋषियों द्वारा विदा किये जाने पर (जब) अपने नगर में प्रवेश करेगा तब अन्तःपुर की स्त्रियों से मिलने के बाद यहाँ के वृतान्त (विवाह आदि की बात) को याद करेगा या नहीं ? प्रियंवदा:-- विश्वस्त (निश्चिन्त) रहो । उस प्रकार की विशिष्ट (सुन्दर) आकृतियां गुणों से रहित नहीं होती हैं । पिता (कण्व) इस समाचार को सुनकर न जाने क्या करेंगे ? (अर्थात्‌ शकुन्तला के गान्धर्व विवाह का अनुमोदन करेंगे, अथवा नहीं - यह बात विचारणीय है ) अनसूया:-- जैसा मैं समझती हूँ, वैसा (यह) उनको अनुमत (स्वीकृत) होगा (अर्थात्‌ वे इस विवाह का अनुमोदन कर देगें) । प्रियंवदा:-- कैसे ? अनसूया:-- गुणवान्‌ व्यक्ति को कन्या देनी चाहिये - यह (माता-पिता का) पहला सङ्कल्प (दृढ विचार) होता है । उसको यदि भाग्य ही सम्पन्न (पुरा) कर देता है, तब तो गुरुजन (माता-पिता) बिना प्रयास के ही कृतकृत्य हो गये । प्रियंवदा:-- (पुष्पों के पात्र (टोकरी) को देखकर) सखी, पूजा-कार्य (बलिकर्म) के लिये पर्याप्त पुष्प चुन लिये गये । अनसूया:-- किन्तु सखी शकुन्तला के सोभाग्य (विवाह) देवता की पूजा करनी है । प्रियंवदा:-- ठीक है । (फिर उसी कार्य (अर्थात्‌ पुष्प चुनने) का अभिनय करती है) । (नेपथ्य में) यह मैं (आया) हूँ । अनसूया:-- सखी, (किसी) अतिथि का वचन (कथन) है (अर्थात्‌ ऐसा लग रहा है कि कोई अतिथि पुकार रहा है)। प्रियंवदा:-- शकुन्तला तो कुटी पर उपस्थित है ही । अनसुया:-- किन्तु आज (वह) हदय से अनुपस्थित है (अर्थात्‌ आज उसका मन कहीं अन्यत्र लगा है) | इतने ही पुष्य (पूजा के लिये) पर्याप्त हैं । (दोनो चल देती हैं)। (नेपथ्य में) अरे, अतिथि का तिरस्कार करने वाली, एकाग्रचित्तवाली (किसी व्यक्ति विशेष पर आसक्त चित्तवाली) जिसका चिन्तन करती हुई (यहाँ) उपस्थित मुझ तपस्वी को नहीं जान (देख) पा रही हो, वह (तेरे द्वारा) स्मरण दिलाये जाने पर भी तुमको (उसी प्रकार) स्मरण नहीं करेगा (जिस प्रकार) उन्मत्त (व्यक्ति) पहले की गयी (कही गयी) बात को (स्मरण नहीं करता है) ।
प्रियवदा:-- हाय धिक्कार है, हाय धिक्कार है । अनर्थ (अप्रिय) ही हो गया । किसी पूजनीय व्यक्ति के प्रति (दुष्यन्त के चिन्तन में आसक्त होने के कारण) शून्य हृदयवाली शकुन्तला ने अपराध कर दिया है । (सामने देखकर) जिस किसी (साधारण व्यक्ति) के प्रति ही (अपराध नहीं किया) । ये सहजतः क्रुद्ध हो जाने वाले महर्षि दुर्वासा हैं । इस प्रकार (शकुन्तला को) शाप देकर वेग के बल से युक्त (अर्थात्‌ अत्यन्त तीव्र) और दुर्निवार्य गति से लौटे जा रहे हैं । अनसुया:-- अग्नि के अतिरिक्त और कौन जलाने मे समर्थ हो सकता है । जाओ (उनके) चरणों में प्रणाम कर (पैरों पर गिरकर) इन्हे लोटा लाओ, जब तक मैं अर्घ और जल (पूजा का सामान) तैयार करती हूँ । प्रियंवदा:-- (जैसा तुम कहती हो) वैसा (करती हूँ) । (यह कहकर निकल जाती है) । अनसूया:-- (कुछ पग चलने के बाद गिरने का अभिनय कर) ओह, आवेग (घबराहट) से लडखडाती हुई चाल के कारण मेरे हाथ से फूल का पात्र (डलिया) गिर गया । (फूलों के उठाने का अभिनय करती है) । प्रियंवदा:-- (प्रवेश करके) सखी, स्वभाव से टेड़े वे (महर्षि दुर्वासा) किसकी प्रार्थना को स्वीकार करते (मानते) हैं ? फिर भी (मैंने उन्हें) कुछ दयायुक्त कर लिया । अनसूया:-- (मुस्कराते हए) उस (दुर्वासा) के विषय में इतना भी बहुत है । बताओ (क्या हुआ) ? प्रियवदा:-- जब लौटने की इच्छा नही किये (अर्थात्‌ लौटने को तैयार नहीं हुए) तब मैने उनसे प्रार्थना की - "भगवन्‌ तप के प्रभाव को न जानने वाली पुत्रीजन (शकुन्तला) का यह पहला अपराध है - (यह समझकर) आप के द्वारा उसका यह एक अपराध क्षन्तव्य है (ये क्षमा कर दीजिये) । अनसुया:-- तब, तब (क्या हआ) ? प्रियवदा:-- तब मेरा वचन असत्य (अन्यथा) नहीं हो सकता, किन्तु पहचान (अभिज्ञान) के आभुषण को दिखाने से शाप समाप्त हो जायेगा - यह कहते, हुए ही (वे) अदृश्य (अनःर्हित) हो गये । अनसुया:-- अब (हम लोग) धैर्य-धारण के लिये समर्थ हैं (अर्थात्‌ अब हम धैर्य रख सकती हैं) । (अपनी राजधानी को) जाते हुए - उस राजर्षि ने अपने नाम से अंकित अंगूठी स्मृति-चिन्ह के रूप में (शकुन्तला कीः उंगली में) स्वयं पहनायी थी । शकुन्तला उस (अंगूठी) से स्वतन्त्रः उपाय वाली होगी (अर्थात्‌ उस अंगूठी से शकुन्तला शाप-मुक्त देने से पहचान ली जायेगी)। प्रियवदा:-- सखी आओ । तब तक देवकार्य (देव-पूजन) सम्पन्न कर लें । (दोनों घूमती हैं) । प्रियंवदा:-- (देखकर) अनसूया, देखो तो । बायें हाथ पर मुंह रक्खी हई प्रिय सखी (शकुन्तला) चित्रित-सी (बैठी हुई) है । पति सम्बन्धी चिन्ता से उसे अपनी भी सुध नहीं है (अर्थात्‌ अपने को भी भूल गयी है) । फिर अतिथि की (बात ही) क्या ? अनसूया:-- प्रियंवदा, यह समाचार हम दोनों के मुख तक ही (सीमित) रहे । निश्चय ही स्वभाव से कोमल प्रियसखी (शकुन्तला) की रक्षा करनी चाहिये । प्रियंवदा:-- भला कौन नवमालिका (चमेली) को गर्म जल से सींचता है - सींचेगा (अर्थात्‌ कोई नहीं) । (दोनो निकल जाती हैं) । ॥ विष्कम्भक समाप्त ॥ (तत्पश्चात्‌ सोकर उठा हुआ शिष्य प्रवेश करता है) शिष्य:-- प्रवास से लौटे हुए आदरणीय कण्व के दवारा समय को जानने के लिये मुझे आदेश दिया गया है । तो प्रकाश में निकलकर देखता हूँ कि रात का कितना (भाग) शेष है । (चारों ओर घुमकर और देखकर) प्रातःकाल हो गया .है । क्योकि एक ओर वनस्पतियों का स्वामी (चन्द्रमा) अस्ताचल के शिखर की ओर जा रहा है (अर्थात्‌ अस्त हो रहा है) । (और) एक ओर (दूसरी ओर) अरुण (नामक अपने सारथि) को आगे किये हुए सूर्य प्रकट (उदित) हो रहा है । (इस प्रकार यह) संसार दो तेजों (चन्द्रमा और सूर्य) के एक साथ अस्त एवं उदित होने से अपनी अवस्थाओं (दशाओं) के परिवर्तित होने के विषय में मानों नियन्त (नियमित) किया जा रहा है (अर्थात्‌ संसार को अपरिहार्य उत्थानपतन के विषय में बताया जा रहा है) ।
और भी - चन्द्रमा के अस्त हो जाने पर (छिप जाने पर) स्मरणीय (नष्ट) शोभा वाली (अर्थात्‌ शोभाविहीन) होने से वही कुमुदिनी सम्प्रति मेरी दृष्टि को आनन्दित नहीं कर रही है । निश्चय ही स्त्री-समाज के लिये अपने इष्ट व्यक्ति के प्रवास से उत्पन्न दुःख अत्यन्त असह्य होते हैं । (बिना पर्दा उठाये हाथ से पर्दा हटाने के साथ प्रवेश करके) अनसुया:-- यद्यपि (सांसारिक) विषयों से विमुख (हम जैसे) लोगों को यह (सब) ज्ञात नहीं है, तथापि (मेरी समझ से) उस राजा (दुष्यन्त) के द्वारा शकुन्तला के साथ (निश्चय ही) अशिष्ट (अभद्र) व्यवहार किया गया है। शिष्य:-- तो (चलकर) गुरुजी से कहता हूँ कि हवन का समय हो गया है । (यह कह कर निकल जाता है) । अनसूया:-- जागी हुई भी (जाग कर भी) मैं क्या करूंगी ? (प्रातःकाल) के उचित (अभ्यस्त) करणीय कार्यों में भी मेरे हाथ-पैर नहीं फैल (चल) रहे हैं । कामदेव की इच्छा अब पूरी हो जिसने झूठी प्रतिज्ञा करने वाले व्यक्ति (दुष्यन्त) के प्रति शुद्ध हृदय वाली भोली-भाली सखी (शकुन्तला) को समर्पित (प्रेमासक्त) करा दिया । अथवा दुर्वासा का शाप (ही) यह अनर्थ (गड़बड़) करा रहा है । नहीं तो कैसे वे राजर्षि उस प्रकार की (प्रेमभरी) बातें कर इतने दिनों तक एक पत्र भी नहीं भेजते । अतः यहाँ से हम पहचान की अँगूठी उनके पास भेजते हैं । (अब समस्या यह है कि अँगूठी ले जाने के लिये) कष्ट सहने वाले (निरन्तर तपस्याजनित कष्ट झेलने वाले) तपस्वी लोगों में किससे प्रार्थना की जाए ? निश्चित ही सब दोष (अपराध) सखी (शकुन्तला) पर ही आयेगा । (कहने के लिये) उद्यत होकर भी (व्यवसिसताऽपि) मैं प्रवास से लोटे हुए पिता कण्व से, दुष्यन्त के साथ (गान्धर्व विधि से) शकुन्तला के विवाहित और गर्भिणी होने की बात नहीं कह सकती । (अर्थात्‌ पिता कण्व को यह नहीं बता सकती कि शकुन्तला का दुष्यन्त के साथ गान्धर्व-विधि से विवाह हो गया है और वह गर्भिणी है) । ऐसी दशा में हमे क्या करना चाहिये ? प्रियंवदा:-- (प्रवेश कर) (प्रसत्नतापूर्वक) सखी, शकुन्तला के प्रस्थान (विदाई) के मांगलिक कार्यों को पूरा करने के लिये शीघ्रता करो, शीघ्रता करो । अनसूया:-- सखी, यह कैसे ? प्रियंवदा:-- सुनो । अभी सुखपूर्वक सोयी कि नहीं - यह पूछने की इच्छा से मैं शकुन्तला के पास गयी थी । अनसुया:-- तब, तब (क्या हुआ) ? प्रियंवदा:-- तब लज्जा से झुके हुए मुख वाली इस (शकुन्तला) को गले लगाकर पिता कण्व के द्वारा इस प्रकार अभिनन्दन किया गया - 'सोभाग्य से धूयें से व्याकुल दृष्टि वाले भी यजमान की आहुति अग्नि में ही गिरी (पड़ी) है । बेटी, सुशिष्य को दी गयी विद्या की भाँति (तुम) अशोचनीय हो गयी हो (अर्थात्‌ तुम्हारे विषय में मुझे अब कोई चिन्ता नहीं है) । आज ही ऋषियों से सुरक्षित तुमको पति (दुष्यन्त) के पास भेज रहा हूँ । अनसूया:-- तो किसके द्वारा पिता कण्व को (यह) समाचार बताया गया ? प्रियंवदा:-- यज्ञशाला (अग्निशरण) में गये हुए (उनको) शरीर-रहित छन्दोमयी वाणी (आकाशवाणी) के द्वारा (यह समाचार) (बताया गया है) । अनसूया:-- (आश्चर्य के साथ) किस प्रकार ? प्रियंवदा:-- (संस्कृत का आश्रय लेकर अर्थात्‌ संस्कृत भाषा में) हे ब्राह्मण, दुष्यन्त के द्वारा स्थापित तेज (वीर्य, सन्तान) को, पृथ्वी के कल्याण के लिये धारण करने वाली पुत्री (शकुन्तला) को, अपने अन्दर अग्नि को धारण करने वाली शमीलता की भाँति समझो (जानो) ।
अनसूया:-- (प्रियंवदा का आलिङ्गन कर) सखी, मुझको प्रसन्नता है, किन्तु आज ही शकुन्तला (पतिगृह) ले जायी जा रही है, इसलिये (दुखमिश्रित) सन्तोष का अनुभव कर रही हूँ । प्रियंवदा:-- सखी, हम दोनों तो अपनी उत्कण्ठा को दूर कर लेगें । (किन्तु) वह बेचारी (तपस्विनी) तो सुखी हो । अनसूया:-- तो इस आम की शाखा (डाली) में लटकते हुए नारियल के डिब्बे (समुद्गक) में मेरे द्वारा इस अवसर के लिये ही देर तक रुकने (ताजी रहने) वाली मोलश्री रखी गयी है । तो तुम इसको हस्तगत कर लो (हाथ में ले लो) । तब तक मैं भी उसके लिये गोरोचन, तीर्थो की मिट्टी और दूब के अंकुर आदि मांगलिक वस्तुओं को तैयार करती हूँ । प्रियवदा:-- (जैसा तुम कहती हो) वैसा ही करो । (अनसूया निकल जाती है । प्रियंवदा अभिनय के साथ पुष्पों को लेती है ।) (नेपथ्य में) गोतमी, शकुन्तला को (पतिगृह हस्तिनापुर) ले जाने के लिये शार्गरव आदि को अदेश दे दो। प्रियंवदा:-- (कान लगाकर) अनसूया, शीघ्रता करो, शीघ्रता करो । हस्तिनापुर को जाने वाले ऋषि बुलाये जा रहे हैं । (माङ्गलिक वस्तुओं को हाथ में लिये हए प्रवेश कर) अनसूया:-- सखी, आओ चलें, (दोनों चारों ओर घूमती हैं) । प्रियंवदा:-- (देखकर) सूर्योदय होते ही शिर धोकर स्नान की हुई (पूर्णरूपेण स्नान की हुई) यह शकुन्तला, नीवार को हाथ में लेकर स्वस्तिवाचन का पाठ करने वाली तपस्विनियों द्वारा अभिनन्दित होती हई बैठी है । हम दोनों इसके पास चलें । दोनो (प्रियंवदा तथा अनसूया) उसके पास जाती हैं) । (तत्पश्चात्‌ पूर्वोक्त कार्य करती हुई और आसन पर बैठी हुई शकुन्तला प्रवेश करती है) तपस्विनियो में से एक:-- (शकुन्तला के प्रति) बेटी, पति के अत्यन्त सम्मानसूचक "महादेवी" शब्द (सम्बोधन) को प्राप्त करो । दूसरी:-- बेटी, वीरपुत्र को जन्म देने वाली हो । तीसरी:-- बेटी, पति द्वारा बहुत सम्मान वाली हो । (आशीर्वाद देकर गौतमी को छोडकर सभी चली जाती हैं) । दोनों सखियाँ:-- (समीप जाकर) सखी, तुम्हारा स्नान सुखकर (मङ्गलमय) हो (अर्थात्‌ तुम सुखी रहो) । शकुन्तला:-- मेरी सखियों (तुम दोनों) का स्वागत है । इधर बैठो । दोनों:-- (माङ्गलिक पात्र को लेकर और बैठकर) सखी, तैयार हो जाओ । हम दोनों (तुम्हारा) माङ्गलिक अलङ्करण (प्रसाधन, सजावट) करेंगी । शकुन्तला:-- यह (तुम्हारे द्वारा किये जाने वाले अलङ्करण) बहुत समझने योग्य (आदरणीय) हैं । (क्योकि) अब (पति के घर) मेरे लिये सखियों द्वारा अलङ्कृत होना दुर्लभ हो जायेगा । (आंसू गिराती है) । दोनों सखी:-- माङ्गलिक बेला में तुम्हारा (इस प्रकार) रोना उचित नहीं है । (आंसुओं को पोछकर अभिनय के साथ अलंकृत करती हैं ) । प्रियंवदा:-- आभूषण के योग्य (शकुन्तला का यह) रूप (सौन्दर्य) आश्रम में सुलभ (उपलब्ध) (पुष्प आदि) अलंकारों द्वारा विकृत किया (बिगाड़ा) जा रहा है । (हाथ में उपहार लिये दो ऋषिकुमार प्रवेश कर) । दोनों:-- यह अलंकार (आभूषण) हैं । (इनसे) आदरणीया (शकुन्तला) अलंकृत की जायें (अर्थात्‌ आप लोग इन आभूषणों से शकुन्तला को सजाइये) । (सभी देखकर चकित हो जाते हैं) गौतमी:-- बेटा नारद, यह कहां से (मिला) । पहला:-- पिता कण्व के प्रभाव से। गौतमी:-- क्या (यह उनकी) मानसी सिद्धि (मानस-संकल्प का फल) है । दूसरा:-- कदापि नहीं, सुनिये । पूज्य (कण्व) द्वारा हम लोगों को आज्ञा दी गयी कि शकुन्तला के लिये वनस्पतियों (पेड-पौधों) से पुष्प को लाओ । तत्पश्चात्‌ अब किसी वृक्ष के द्वारा हम लोगों को चन्द्रमा के समान शुभ्र (धवल) मांगलिक रेशमी वस्त्र प्रकट कर दिया गया । किसी (वृक्ष) के द्वारा पैरों को रँगने योग्य लाक्षारस (महावर) चुवाया (दिया) गया । अन्य (वृक्षों) के द्वारा कलाई (पर्वभाग) तक उठे हुए और निकलते हुए नवपल्लवों के समान वनदेवता के करतलों (हथेलियों) से आभूषण दिये गये ।
प्रियवदा:-- (शकुन्तला को देखकर) सखी, (वनस्पतियों की) इस अनुकम्पा (अनुग्रह) से सूचित होता है कि तुम्हारे द्वारा पति के घर में राजलक्ष्मी अनुभव की जायेगी (अर्थात्‌ तुम पति के घर में राजलक्ष्मी का भोग करोगी) । (शकुन्तला लज्जा का अभिनय करती है) पहला:-- गौतम, आओ-आओ । स्नान कर लौटे हुये कण्व को वनस्पतियों की (इस) सेवा को बता दें। दूसरा:-- ठीक है । (दोनों निकल जाते हैं) । दोनों सखियां:-- अरे, यह जन (शकुन्तला हमीं लोगों की भाँति) आभूषण का अनुपयोक्ता (उपयोग न करने वाला) है । (फिर भी) चित्रकला से प्राप्त परिचय (ज्ञान) के आधार पर हम तुम्हारे अंगों में आभूषण पहना देती है। शकुन्तला:-- मैं तुम दोनों की (आभूषण पहनाने की) दक्षता को जानती हूँ । (दोनों अभिनय के साथ आभूषण पहनाती हैं । तत्पश्चात्‌ स्नान कर लौटे हुए कण्व प्रवेश करते हैं ।) कण्व:-- आज शकुन्तला (पति के घर) चली जायेगी, इसलिये (मेरा) हृदय उत्कण्ठा (तीव्र वेदना) से भर गया है । अवरुद्ध अश्रु-प्रवाह से कण्ठ रुध गया है (अर्थात्‌ बहते हुए आंसुओं को रोकने से रुध गया हे) । (मेरी) दृष्टि चिन्ता के कारण जड़ (निश्चेष्ट) (हो गयी है) । (पुत्री शकुन्तला के प्रति) स्नेह के कारण मेरे जैसे वनवासी की ऐसी व्याकुलता (है तब) गृहस्थ लोग नये (पहली बार होने वाले) पुत्री के वियोग जनित दुख से क्यों न पीडित होते होंगे ? (चारों ओर घूमते हुए) ।
दोनों सखियाँ:-- सखी शकुन्तला, (तुम) प्रसाधन से परिपूर्ण हो गयी हो (अर्थात्‌ तुम्हारा श्रृंगार (सजावट ) पूरा हो गया है) । अब (इन) दो रेशमी-वस्त्रों को पहन लो । (शकुन्तला उठकर पहनती है) गौतमी:-- बेटी, आनन्द को प्रवाहित करने वाली दृष्टि से मानो (तुम्हें) गले लगाते हुये ये तुम्हारे पिता (गुरु) कण्व उपस्थित हैं । अतः शिष्टाचार का पालन करो । शकुन्तला:-- (लज्जा के साथ) पिताजी, मैं प्रणाम कर रही हूँ । कण्व:-- बेटी, शर्मिष्ठा (जिस प्रकार) ययाति की अत्यन्त प्रिय थी उसी प्रकार तुम भी (अपने) पति की अत्यन्त प्रिय होओ (बनो) और (शर्मिष्ठा) ने पूरू (नामक पुत्र) को (जैसे प्राप्त किया था) तुम भी (उसी प्रकार) सम्राट पुत्र को प्राप्त करो ।
गौतमी:-- भगवान्‌ , निश्चय ही यह वरदान है, (केवल) आशीर्वाद ही नहीं । कण्व:-- बेटी, अभी हवन की गयी अग्नि की इधर से प्रदक्षिणा करो । (सभी प्रदक्षिणा करते हैं) । कण्व:-- (ऋग्वेद के छन्द में निर्मित श्लोक से आशीर्वाद देते हैं) बेटी, वेदी के चारों ओर स्थापित की गयी समिधाओं (लकडियों) से युक्त (प्रज्वलित) और किनारे-किनारे बिछे हुये कुशो से युक्त यज्ञ की अग्नियाँ हवन की गयी वस्तुओं (हति) की सुगन्ध से पाप को दूर करती हुई तुम (शकुन्तला) को पवित्र करे ।
अब प्रस्थान करो । (इधर-उधर दृष्टि डालकर) वे शार्खगरव आदि कहाँ हैं ? (प्रवेश करके) शिष्य:-- भगवन्‌ , ये हम लोग हैं । कण्व:-- अपनी बहन शकुन्तला को मार्ग दिखाओ (बताओ) । शाङ्खरव:-- आप इधर से, इधर से (आइये) । (सभी घूमते हैं) । कण्व:-- हे, हे समीपस्थ तपोवन के वृक्षों, तुम (आप) लोगों को जल पिलाये बिना जो पहले जल पीने के लिये प्रयास नहीं करती थी (अर्थात्‌ आप लोगों को बिना सिंचे जो जल नहीं पीती थी), आभूषण की प्रेमी होने पर भी जो आप लोगो के स्नेह के कारण (आप लोगों के) नये पत्तों को नहीं लेती (तोडती) थी, तुम (आप) लोगो के पहली बार पुष्प निकलने के समय जिसका उत्सव होता था (जो आनन्दित होती थी) वही यह शकुन्तला (अपने) पति के घर (ससुराल) जा रही है। (आप) सभी लोग (उसे) अनुमति (स्वीकृति) प्रदान करें ।
(कोकिल के शब्द को (सुनने की सूचना देकर) अभिनयकर) इस शकुन्तला को वनवास के बन्धु (साथी) वृक्षों द्वारा (पतिगृह) जाने के लिये अनुमति मिल गयी है । क्योकि मनोहर कोयल के शब्द (कूक) को इन (वृक्षों) के द्वारा इस प्रकार प्रत्युत्तर बनाया गया है (अर्थात्‌ इन वृक्षों ने कोयल की कूक द्वारा शकुन्तला को पतिगृह जाने के लिये प्रकारान्तर से अनुमति दे दी है)।
(आकाश में) इस (शकुन्तला) का मार्ग कमलिनियों से हरे-भरे तालाब के द्वारा रमणीय (मनोहर) मध्यभाग वाला (हो) । छाया वाले वृक्षों से नियन्त्रित सूर्य की किरणों के ताप वाला हो । कमलों के पराग से कोमल धूलि युक्त शान्त और अनुकूल वायु वाला एवं कल्याणकारी हो ।
(सभी लोग आश्वर्यपूर्वक सुनते हैं) गौतमी:-- बेटी, बन्धुजनो के समान प्रेम करने वाले तपोवन के देवताओं द्वारा तुम्हे (पतिगृह) जाने के लिये अनुमति (स्वीकृति) मिल गयी है । अतः देवताओं को प्रणाम करो । शकुन्तला:-- (प्रणाम करती हुई चारों ओर घूमकर । हाथ की ओट में) सखी प्रियंवदा, आर्यपुत्र (दुष्यन्त) के दर्शन के लिये उत्कण्ठित होने पर भी आश्रम-भूमि को छोड़ते हुए मेरे पैर दुख के साथ (कठिनाई से) आगे की ओर बढ़ रहे हैं । प्रियंवदा:-- केवल सखी (तुम शकुन्तला) ही तपोवन के वियोग से व्याकुल (दुखी) नहीं हो । तुम्हारे वियोग (विदाई) के समय उपस्थित होने के कारण तपोवन की भी (तुम्हारे) समान अवस्था दिखायी पड़ रही है । (तुम्हारे वियोग से दुखी) हरिणियों ने कुश के ग्रास (कवल) को उगल दिया है, मयूरो (मोरों) ने नाचना छोड दिया है और लताएँ पीले पत्तों को गिराकर (डालकर) मानो आंसुओं को बहा रही हैं ।
शकुन्तला:-- (याद करके) हे पिता जी, तो मैं अपनी लता-बहन वनज्योत्स्ना से विदाई ले लूं ? कण्व:-- मैं जानता हूँ कि तुम्हारा उस पर सगी बहन-सा प्रेम है । तो यह (वनज्योत्स्ना) दाहिनी ओर है । शकुन्तला:-- (पास जाकर लता को गले से लगाकर) वनज्योत्स्ना, (अपने पति) आम से लिपटी हुई भी इधर फ़ैली हुई शाखारूपी भुजाओं से मेरा आलिङ्गन कर लो (अर्थात्‌ मुझसे गले मिल लो) । आज से मैं तुमसे दूर हो जाऊंगी । कण्व:-- मैंने तुम्हारे लिये पहले से ही (जिसका) सङ्कल्प किया था । अपने अनुरूप (उस) पति को तुम (अपने) पुन्यों (भाग्य) से पा गयी हो। यह नवमालिका (भी) आम वृक्ष से मिल गयी है । अब मैं इसके और तुम्हारे विषय में चिन्ता से मुक्त (निश्चिन्त) हो गया हूं ।
इधर से मार्ग पर आ जाओ । शकुन्तला:-- (दोनों सखियों से) सखियो, यह (लता) तुम दोनों के हाथ में (मेरी) धरोहर (निक्षेप) है । दोनों सखियां:-- यह जन किसके हाथ में सौम्पा जा रहा है (अर्थात्‌ हम दोनों को किसके हाथ में सोप रही हो) । (दोनों ओंसू बहाती हैं) । कण्व:-- अनसूया, रोओ मत । आप दोनों द्वारा शकुन्तला को धैर्य बंधाना चाहिये । (सभी लोग चारों ओर घुमते हैं) । शकुन्तला:-- हे पिता जी, कुटी के समीप विचरण करने वाली (और) गर्भ के कारण मन्द गति वाली यह हरिणी (मृगवधू) जब निर्विष्न (सकुशल) बच्चा पैदा करेगी तो (इस) प्रिय समाचार की सूचना देने वाले किसी व्यक्ति को मेरे पास भेजियेगा । कण्व:-- इस (बात) को नहीं भूलूंगा । शकुन्तला:-- (चलने में रुकावट का अभिनय कर) यह कौन मेरे वस्त्र में लिपट रहा है ? (पीछे मुडती है) । कण्व:-- बेटी, जिसके कुशो के अग्रभाग (नोंक) से बिंधे हुये मुख में तुम्हे द्वारा घावों को भरने वाला इङ्गुदी (हिङ्गोट) का तेल लगाया गया था, वही यह सांवा की मुठ्ठियों (ग्रासो) को खिलाकर बड़ा किया गया (पाला गया) और (तुम्हारे द्वारा) पुत्र की भाँति माना गया हरिण तुम्हारे मार्ग को नहीं छोड़ रहा है ।
शकुन्तला:-- पुत्र ! साथ छोडकर जाने वाली मेरे पीछे क्यों आ रहे हो । जन्म देकर तत्काल (मरी हुई) माता के बिना (भी) तुम पाले ही गये हो । अब भी मुझसे वियुक्त (छोड़े गये) तुमको पिता जी पालेंगे । (रोती हुई प्रस्थान करती है) । कण्व:-- ऊपर की ओर उठी हुई बरौनियों वाले नेत्रों के व्यापार (दर्शनशक्ति) को रोकने वाले आंसुओं के प्रवाह को धर्यपूर्वक रोको । (क्योंकि) अदृश्य (दिखाई न पड़ने वाले) भूमिभाग वाले इस मार्ग में तुम्हारे पैर निश्चय ही लड़खडा रहे हैं ।
शाङ्गरवः-- भगवन्‌ , (यात्रा के समय) प्रिय व्यक्ति का जलाशय तक अनुगमन करना चाहिये - ऐसा सुना जाता है । तो यह सरोवर का तट है । यहाँ (दुष्यन्त से कहने के लिये हम लोगों को अपना) सन्देश देकर आप लौट जायें । कण्व:-- तो हम लोग इस दूध वाले (बरगद या पीपल) वृक्ष की छाया का आश्रय लें (छाया मे रुकें) । (सभी लोग धूमकर रुक जाते हैं) । कण्व:-- (अपने मन में) हमें माननीय दुष्यन्त के लिये अधिक उचित क्या सन्देश भेजना चाहिये । (सोचते हैं) । शकुन्तला:-- (हाथ की ओट में) सखी, देखो । कमलिनी के पत्ते की ओट में छुपे हुये भी (अपने) साथी (चकवे) को न देखने से व्याकुल यह चकवी चिल्ला रही है । (इससे मुझे लग रहा है कि) मैं दुष्कर-कार्य कर रही हूँ (क्योकि अपने प्रियतम से इतनी दूर होने पर भी मुझे कुछ नहीं हो रहा है) । अनसुया:-- सखी, ऐसा मत कहो । यह (चकवी) भी (अपने) प्रिय (चकवे) के बिना दुख के कारण (अत्यधिक) लम्बी (प्रतीत होने वाली) रात को बिताती है । आशा का बन्धन महान्‌ (बड़े से बड़े) वियोग के दुख को सहन करा देता है ।
कण्व:-- शाङ्गरव, तुम मेरी ओर से शकुन्तला को आगे कर राजा से इस प्रकार कहना । शाङ्गरव:-- आप आज्ञा दें । कण्व:-- संयम रूपी धन वाले हम लोगों को, अपने ऊँचे कुल को और तुम्हरे (आपके) ऊपर इस (शकुन्तला) के, किसी भी प्रकार बन्धुओं (सम्बन्धियों) के द्वारा न कराये गये (एच्छिक प्रेम-व्यापार को भी) विचार कर तुम्हारे (आपके) द्वारा यह (शकुन्तला) (सभी) पत्नियों (रानियों) में समान गौरव (आदर) के साथ देखी जानी चाहिये । इसके आगे (अर्थात्‌ इससे अधिक) भाग्य के अधीन है, वह वस्तुतः वधू (कन्या) के सम्बन्धियों (भाई-बन्धुओं) द्वारा नहीं कहा (मांगा) जाना चाहिये (अर्थात उसके विषय में कन्या के भाई-बन्धुओं को कुछ नहीं कहना चाहिये) ।
शाङ्गरवः- (मैने आप का) सन्देश ग्रहण कर लिया ( अर्थात्‌ समझ लिया) । कण्व:-- बेटी, अब तुम्हे (भी) कुछ शिक्षा देनी है । वनवासी होते हुये भी हम लोग लोकव्यवहार को जानने वाले हैं । शाङ्गरव:-- वस्तुतः बुद्धिमानों को कुछ भी अज्ञात नहीं है । कण्व:-- तुम यहां से पतिगृह को पहुंचकर गुरुजनों (बड़ो) की सेवा करना, सपत्नियों (सोतों) के साथ प्रियसखी जैसा व्यवहार करना, तिरस्कृत होने पर भी क्रोधवश पति के प्रतिकूल आचरण न करना, सेवकसेविकाओं के प्रति अत्यधिक उदार रहना और (अपने) अच्छे भाग्य पर निरभिमान (होना) (अर्थात्‌ गर्व मत करना) । इस प्रकार (आचरण करने वाली) युवतियां गृहिणी (गृहलक्ष्मी) के पद को प्राप्त करती हैं और इसके प्रतिकूल आचरण करने वाली (युवतियां) कुल के लिये व्याधि (विपत्ति का कारण) बनती हैं ।
अथवा गौतमी (इस विषय में) क्या सोचती (मानती) है (अर्थात्‌ गोतमी का क्या मत है ?) । गौतमी:-- इतना उपदेश वधुओं (नव विवाहित युवतियों) के लिये (पर्याप्त) है । बेटी, यह सब अवश्य ही (भली-भांति) याद रखना । कण्व:-- बेटी, मुझसे और (अपनी) सखियों से गले मिल लो । शकुन्ला:-- पिताजी, क्या यहाँ से ही प्रियवदा और अनसुया - दोनो सखियाँ लौट जायेंगी ? कण्व:-- बेटी, इन दोनों को भी देना है (अर्थात्‌ इन दोनों का भी विवाह करना है) इनका वहाँ (हस्तिनापुर) जाना उचित नहीं है । तुम्हारे साथ गौतमी जायेगी । शकुन्तला:-- (पिता से लिपटकर) पिता की गोद से अलग होकर अब मैं मलय पर्वत के तट से उखाड़ी गयी चन्दन-लता की भांति, दूसरे देश में कैसे जीवन धारण करूंगी (अर्थात्‌ वहाँ कैसे जाउंगी) । कण्व:-- बेटी, क्यो इस प्रकार व्यकुल (दुखी) हो रही हो ? हे बेटी, तुम उत्तम कुल में उत्पन्न (अपने) पति के प्रशंसनीय गृहिणी (महारानी) के पद पर प्रतिष्ठित होकर, उस (पति) के एश्वर्य (समृद्धि) के कारण महत्त्वपूर्ण कार्यो से प्रतिक्षण (सतत) व्यस्त रहती हुई और शीघ्र ही, पूर्व दिशा जिस प्रकार पवित्र सूर्य को जन्म देती है उसी प्रकार, पवित्र पुत्र को जन्म देकर मेरे विरह जनित शोक को नहीं गिनोगी (अर्थात्‌ भूल जाओगी) ।
(शकुन्तला पिता के पैरों पर गिरती है) कण्व:-- मैं तुम्हारे लिये जो चाहता हूं, वह (पूर्ण) हो। शकुन्तला:-- (सखियों के पास जाकर) सखियों, तुम दोनों भी एक साथ ही मेरा अलिङ्गन करो । दोनों सखियाँ:-- (वैसा कर अर्थात्‌ गले लगाकर) - सखी यदि वह राजा (तुम्हे) पहचानने में शिथिल हो (अर्थात्‌ देर करे) तो उसके अपने नाम से अङ्कित यह अँगूठी (उसे) दिखा देना । शकुन्तला:-- मैं तुम्हारे इस संदेह से कांप गई हूँ । दोनों सखियाँ:-- डरो मेत । अत्यधिक प्रेम (अनुराग) पाप की शंका करने वाला होता है । (अर्थात्‌ अत्यधिक स्नेह के कारणः अनिष्ट की आशङ्का हुआ करती है) शाङ्गरव:-- सूर्य दूसरे पहर (युगांतर) में चढ़ गया है । (इसलिये) आदरणीय आप (शकुन्तला) शीघ्रता करें । शकुन्तला:-- (आश्रम की ओर मुख किये हुए खड़ी होकर) पिता जी, मैं फिर कब तपोवन को देखूंगी (अर्थात्‌ आप मुझे फिर कब बुलाएंगे) ? कण्व:-- सुनो ! बहुत दिनों तक चारों (समुद्र) तक फैली हुई पृथ्वी की सपत्नी (राजा दुष्यन्तं की पटरानी) होकर और अपने अद्वितीय महारथी दुष्यन्त से उत्पन्न पुत्र को (राज-सिंहासन पर) प्रतिष्ठित करा कर (बैठाकर) और उस (पुत्र) को कुटुम्ब का भार सौंपने वाले पति (दुष्यन्त) के साथ इस शान्त आश्रम में फिर (आकर) निवास करोगी ।
गौतमी:-- पुत्री, जाने का समय बीत रहा है । (इसलिये) पिता जी को लौटाओ । अथवा यह (शकुन्तला) बहुत देर तक बार-बार इसी प्रकार कहती रहेगी । (इसलिये अब) आप (ही) लौट जाइये । कण्व:-- बेटी, (मेरी) तपस्या का अनुष्ठान रुक रहा है (इसलिये) मुझे जाने दो । शकुन्तला:-- (पुनः पिता से लिपटकर) पिता जी का (अर्थात्‌ आप का) शरीर तपस्या के आचरण से (अत्यन्त) कृश (पीड़ित) है । इसलिये मेरे लिये आप अत्यधिक दुखी मत होये । कण्व:-- (उच्छवास लेते हये) बेटी ! तुम्हारे द्वारा पहले (भूतबलि के रूप में) बनाये गये (पक्षियों आदि के खाने के लिये डाले (बिखेरे गये) (और अब कुटी के द्वार पर उगे हुये) नीवार (जङ्गली धान) को देखते हुये मेरा शोक कैसे शान्ति को प्राप्त होगा ? जाओ । तुम्हारा मार्ग मङ्गलमय हो । (शकुन्तला और उसके साथ जाने वाले लोग निकल जाते हैं) । दोनों सखि्यां:-- (शकुन्तला को देखकर) हाय कष्ट है, हाय कष्ट हे, शकुन्तला वृक्षों (वन) की पंक्ति से ओझल हो गयी । कण्व:-- (ऊंची सांस लेते हुये) अनसूया, तुम लोगों की सखी चली गयी । तुम लोग अपने शोक को रोककर (आश्रम की ओर) प्रस्थान करने वाले मेरा अनुगमन करो (मेरे पीछे-पीछे आओ) । दोनों:-- पिता जी, शकुन्तला से रहित (इस) सूने से तपोवन में हम कैसे प्रवेश करें । कण्व:-- प्रेम प्रवाह (भाव) इसी प्रकार दिखाने वाला होता है (अर्थात्‌ प्रेम के आधिक्य के कारण व्यक्ति को ऐसा ही अनुभव होता है) । (विचार-मग्न चारों ओर घूमकर) अहा! शकुन्तला को पति के घर (अर्थात्‌ ससुराल) भेजकर अब (मुझे) निश्चिंतता (मानसिक शान्ति) प्राप्त हुई । क्योकि कन्या (लडकी) वस्तुतः दूसरे का ही धन है । आज उस (कन्या) को पति के (पास) भेजकर मेरा यह अन्तःकरण उसी प्रकार अत्यन्त प्रसन्न हो गया है, जिस प्रकार धरोहर लोटा देने वाले व्यक्ति (का अन्तःकरण अति प्रसन्न) (निश्चिन्त) हो जाता है । (सभी निकल जाते हैं) ।। चतुर्थ अंक समाप्त ।।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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