अध्याय 4 — चतुर्थ अंक
अभिज्ञानशाकुन्तलम्
20 श्लोक • केवल अनुवाद
(तत्पश्चात् फूल चुनने का अभिनय करती हुयी दोनों सखियाँ प्रवेश करती हैं)
अनसुया:--
सखी प्रियंवदा, गन्धर्व (विवाह) विधि से सम्पन्न (विवाह रूप) कल्याण (मङ्गल कार्य) वाली शकुन्तला यद्यपि अपने योग्य पति से सङ्गत हो गयी है (अर्थात् अपने योग्य पति को पा गयी है) । इसलिये मेरा हदय आनन्दित (प्रसन्न) है, तथापि इतनी सी बात विचारणीय है ।
प्रियंवदा:--
कौन-सी ?
अनसूया:--
आज वह राजर्षि (दुष्यन्त) यज्ञ को समाप्त करने के बाद ऋषियों द्वारा विदा किये जाने पर (जब) अपने नगर में प्रवेश करेगा तब अन्तःपुर की स्त्रियों से मिलने के बाद यहाँ के वृतान्त (विवाह आदि की बात) को याद करेगा या नहीं ?
प्रियंवदा:--
विश्वस्त (निश्चिन्त) रहो । उस प्रकार की विशिष्ट (सुन्दर) आकृतियां गुणों से रहित नहीं होती हैं । पिता (कण्व) इस समाचार को सुनकर न जाने क्या करेंगे ? (अर्थात् शकुन्तला के गान्धर्व विवाह का अनुमोदन करेंगे, अथवा नहीं - यह बात विचारणीय है )
अनसूया:--
जैसा मैं समझती हूँ, वैसा (यह) उनको अनुमत (स्वीकृत) होगा (अर्थात् वे इस विवाह का अनुमोदन कर देगें) ।
प्रियंवदा:--
कैसे ?
अनसूया:--
गुणवान् व्यक्ति को कन्या देनी चाहिये - यह (माता-पिता का) पहला सङ्कल्प (दृढ विचार) होता है । उसको यदि भाग्य ही सम्पन्न (पुरा) कर देता है, तब तो गुरुजन (माता-पिता) बिना प्रयास के ही कृतकृत्य हो गये ।
प्रियंवदा:--
(पुष्पों के पात्र (टोकरी) को देखकर) सखी, पूजा-कार्य (बलिकर्म) के लिये पर्याप्त पुष्प चुन लिये गये ।
अनसूया:--
किन्तु सखी शकुन्तला के सोभाग्य (विवाह) देवता की पूजा करनी है ।
प्रियंवदा:--
ठीक है । (फिर उसी कार्य (अर्थात् पुष्प चुनने) का अभिनय करती है) ।
(नेपथ्य में) यह मैं (आया) हूँ ।
अनसूया:--
सखी, (किसी) अतिथि का वचन (कथन) है (अर्थात् ऐसा लग रहा है कि कोई अतिथि पुकार रहा है)।
प्रियंवदा:--
शकुन्तला तो कुटी पर उपस्थित है ही ।
अनसुया:--
किन्तु आज (वह) हदय से अनुपस्थित है (अर्थात् आज उसका मन कहीं अन्यत्र लगा है) | इतने ही पुष्य (पूजा के लिये) पर्याप्त हैं । (दोनो चल देती हैं)।
(नेपथ्य में) अरे, अतिथि का तिरस्कार करने वाली, एकाग्रचित्तवाली (किसी व्यक्ति विशेष पर आसक्त चित्तवाली) जिसका चिन्तन करती हुई (यहाँ) उपस्थित मुझ तपस्वी को नहीं जान (देख) पा रही हो, वह (तेरे द्वारा) स्मरण दिलाये जाने पर भी तुमको (उसी प्रकार) स्मरण नहीं करेगा (जिस प्रकार) उन्मत्त (व्यक्ति) पहले की गयी (कही गयी) बात को (स्मरण नहीं करता है) ।
और भी - चन्द्रमा के अस्त हो जाने पर (छिप जाने पर) स्मरणीय (नष्ट) शोभा वाली (अर्थात् शोभाविहीन) होने से वही कुमुदिनी सम्प्रति मेरी दृष्टि को आनन्दित नहीं कर रही है । निश्चय ही स्त्री-समाज के लिये अपने इष्ट व्यक्ति के प्रवास से उत्पन्न दुःख अत्यन्त असह्य होते हैं ।
(बिना पर्दा उठाये हाथ से पर्दा हटाने के साथ प्रवेश करके)
अनसुया:--
यद्यपि (सांसारिक) विषयों से विमुख (हम जैसे) लोगों को यह (सब) ज्ञात नहीं है, तथापि (मेरी समझ से) उस राजा (दुष्यन्त) के द्वारा शकुन्तला के साथ (निश्चय ही) अशिष्ट (अभद्र) व्यवहार किया गया है।
शिष्य:--
तो (चलकर) गुरुजी से कहता हूँ कि हवन का समय हो गया है । (यह कह कर निकल जाता है) ।
अनसूया:--
जागी हुई भी (जाग कर भी) मैं क्या करूंगी ? (प्रातःकाल) के उचित (अभ्यस्त) करणीय कार्यों में भी मेरे हाथ-पैर नहीं फैल (चल) रहे हैं । कामदेव की इच्छा अब पूरी हो जिसने झूठी प्रतिज्ञा करने वाले व्यक्ति (दुष्यन्त) के प्रति शुद्ध हृदय वाली भोली-भाली सखी (शकुन्तला) को समर्पित (प्रेमासक्त) करा दिया । अथवा दुर्वासा का शाप (ही) यह अनर्थ (गड़बड़) करा रहा है । नहीं तो कैसे वे राजर्षि उस प्रकार की (प्रेमभरी) बातें कर इतने दिनों तक एक पत्र भी नहीं भेजते । अतः यहाँ से हम पहचान की अँगूठी उनके पास भेजते हैं । (अब समस्या यह है कि अँगूठी ले जाने के लिये) कष्ट सहने वाले (निरन्तर तपस्याजनित कष्ट झेलने वाले) तपस्वी लोगों में किससे प्रार्थना की जाए ? निश्चित ही सब दोष (अपराध) सखी (शकुन्तला) पर ही आयेगा । (कहने के लिये) उद्यत होकर भी (व्यवसिसताऽपि) मैं प्रवास से लोटे हुए पिता कण्व से, दुष्यन्त के साथ (गान्धर्व विधि से) शकुन्तला के विवाहित और गर्भिणी होने की बात नहीं कह सकती । (अर्थात् पिता कण्व को यह नहीं बता सकती कि शकुन्तला का दुष्यन्त के साथ गान्धर्व-विधि से विवाह हो गया है और वह गर्भिणी है) । ऐसी दशा में हमे क्या करना चाहिये ?
प्रियंवदा:--
(प्रवेश कर) (प्रसत्नतापूर्वक) सखी, शकुन्तला के प्रस्थान (विदाई) के मांगलिक कार्यों को पूरा करने के लिये शीघ्रता करो, शीघ्रता करो ।
अनसूया:--
सखी, यह कैसे ?
प्रियंवदा:--
सुनो । अभी सुखपूर्वक सोयी कि नहीं - यह पूछने की इच्छा से मैं शकुन्तला के पास गयी थी ।
अनसुया:--
तब, तब (क्या हुआ) ?
प्रियंवदा:--
तब लज्जा से झुके हुए मुख वाली इस (शकुन्तला) को गले लगाकर पिता कण्व के द्वारा इस प्रकार अभिनन्दन किया गया - 'सोभाग्य से धूयें से व्याकुल दृष्टि वाले भी यजमान की आहुति अग्नि में ही गिरी (पड़ी) है । बेटी, सुशिष्य को दी गयी विद्या की भाँति (तुम) अशोचनीय हो गयी हो (अर्थात् तुम्हारे विषय में मुझे अब कोई चिन्ता नहीं है) । आज ही ऋषियों से सुरक्षित तुमको पति (दुष्यन्त) के पास भेज रहा हूँ ।
अनसूया:--
तो किसके द्वारा पिता कण्व को (यह) समाचार बताया गया ?
प्रियंवदा:--
यज्ञशाला (अग्निशरण) में गये हुए (उनको) शरीर-रहित छन्दोमयी वाणी (आकाशवाणी) के द्वारा (यह समाचार) (बताया गया है) ।
अनसूया:--
(आश्चर्य के साथ) किस प्रकार ?
प्रियंवदा:--
(संस्कृत का आश्रय लेकर अर्थात् संस्कृत भाषा में) हे ब्राह्मण, दुष्यन्त के द्वारा स्थापित तेज (वीर्य, सन्तान) को, पृथ्वी के कल्याण के लिये धारण करने वाली पुत्री (शकुन्तला) को, अपने अन्दर अग्नि को धारण करने वाली शमीलता की भाँति समझो (जानो) ।
अनसूया:--
(प्रियंवदा का आलिङ्गन कर) सखी, मुझको प्रसन्नता है, किन्तु आज ही शकुन्तला (पतिगृह) ले जायी जा रही है, इसलिये (दुखमिश्रित) सन्तोष का अनुभव कर रही हूँ ।
प्रियंवदा:--
सखी, हम दोनों तो अपनी उत्कण्ठा को दूर कर लेगें । (किन्तु) वह बेचारी (तपस्विनी) तो सुखी हो ।
अनसूया:--
तो इस आम की शाखा (डाली) में लटकते हुए नारियल के डिब्बे (समुद्गक) में मेरे द्वारा इस अवसर के लिये ही देर तक रुकने (ताजी रहने) वाली मोलश्री रखी गयी है । तो तुम इसको हस्तगत कर लो (हाथ में ले लो) । तब तक मैं भी उसके लिये गोरोचन, तीर्थो की मिट्टी और दूब के अंकुर आदि मांगलिक वस्तुओं को तैयार करती हूँ ।
प्रियवदा:--
(जैसा तुम कहती हो) वैसा ही करो ।
(अनसूया निकल जाती है । प्रियंवदा अभिनय के साथ पुष्पों को लेती है ।)
(नेपथ्य में) गोतमी, शकुन्तला को (पतिगृह हस्तिनापुर) ले जाने के लिये शार्गरव आदि को अदेश दे दो।
प्रियंवदा:--
(कान लगाकर) अनसूया, शीघ्रता करो, शीघ्रता करो । हस्तिनापुर को जाने वाले ऋषि बुलाये जा रहे हैं ।
(माङ्गलिक वस्तुओं को हाथ में लिये हए प्रवेश कर)
अनसूया:--
सखी, आओ चलें, (दोनों चारों ओर घूमती हैं) ।
प्रियंवदा:--
(देखकर) सूर्योदय होते ही शिर धोकर स्नान की हुई (पूर्णरूपेण स्नान की हुई) यह शकुन्तला, नीवार को हाथ में लेकर स्वस्तिवाचन का पाठ करने वाली तपस्विनियों द्वारा अभिनन्दित होती हई बैठी है । हम दोनों इसके पास चलें । दोनो (प्रियंवदा तथा अनसूया) उसके पास जाती हैं) ।
(तत्पश्चात् पूर्वोक्त कार्य करती हुई और आसन पर बैठी हुई शकुन्तला प्रवेश करती है)
तपस्विनियो में से एक:--
(शकुन्तला के प्रति) बेटी, पति के अत्यन्त सम्मानसूचक "महादेवी" शब्द (सम्बोधन) को प्राप्त करो ।
दूसरी:--
बेटी, वीरपुत्र को जन्म देने वाली हो ।
तीसरी:--
बेटी, पति द्वारा बहुत सम्मान वाली हो ।
(आशीर्वाद देकर गौतमी को छोडकर सभी चली जाती हैं) ।
दोनों सखियाँ:--
(समीप जाकर) सखी, तुम्हारा स्नान सुखकर (मङ्गलमय) हो (अर्थात् तुम सुखी रहो) ।
शकुन्तला:--
मेरी सखियों (तुम दोनों) का स्वागत है । इधर बैठो ।
दोनों:--
(माङ्गलिक पात्र को लेकर और बैठकर) सखी, तैयार हो जाओ । हम दोनों (तुम्हारा) माङ्गलिक अलङ्करण (प्रसाधन, सजावट) करेंगी ।
शकुन्तला:--
यह (तुम्हारे द्वारा किये जाने वाले अलङ्करण) बहुत समझने योग्य (आदरणीय) हैं । (क्योकि) अब (पति के घर) मेरे लिये सखियों द्वारा अलङ्कृत होना दुर्लभ हो जायेगा । (आंसू गिराती है) ।
दोनों सखी:--
माङ्गलिक बेला में तुम्हारा (इस प्रकार) रोना उचित नहीं है । (आंसुओं को पोछकर अभिनय के साथ अलंकृत करती हैं ) ।
प्रियंवदा:--
आभूषण के योग्य (शकुन्तला का यह) रूप (सौन्दर्य) आश्रम में सुलभ (उपलब्ध) (पुष्प आदि) अलंकारों द्वारा विकृत किया (बिगाड़ा) जा रहा है ।
(हाथ में उपहार लिये दो ऋषिकुमार प्रवेश कर) ।
दोनों:--
यह अलंकार (आभूषण) हैं । (इनसे) आदरणीया (शकुन्तला) अलंकृत की जायें (अर्थात् आप लोग इन आभूषणों से शकुन्तला को सजाइये) ।
(सभी देखकर चकित हो जाते हैं)
गौतमी:--
बेटा नारद, यह कहां से (मिला) ।
पहला:--
पिता कण्व के प्रभाव से।
गौतमी:--
क्या (यह उनकी) मानसी सिद्धि (मानस-संकल्प का फल) है ।
दूसरा:--
कदापि नहीं, सुनिये । पूज्य (कण्व) द्वारा हम लोगों को आज्ञा दी गयी कि शकुन्तला के लिये वनस्पतियों (पेड-पौधों) से पुष्प को लाओ । तत्पश्चात् अब किसी वृक्ष के द्वारा हम लोगों को चन्द्रमा के समान शुभ्र (धवल) मांगलिक रेशमी वस्त्र प्रकट कर दिया गया । किसी (वृक्ष) के द्वारा पैरों को रँगने योग्य लाक्षारस (महावर) चुवाया (दिया) गया । अन्य (वृक्षों) के द्वारा कलाई (पर्वभाग) तक उठे हुए और निकलते हुए नवपल्लवों के समान वनदेवता के करतलों (हथेलियों) से आभूषण दिये गये ।
अथवा गौतमी (इस विषय में) क्या सोचती (मानती) है (अर्थात् गोतमी का क्या मत है ?) ।
गौतमी:--
इतना उपदेश वधुओं (नव विवाहित युवतियों) के लिये (पर्याप्त) है । बेटी, यह सब अवश्य ही (भली-भांति) याद रखना ।
कण्व:--
बेटी, मुझसे और (अपनी) सखियों से गले मिल लो ।
शकुन्ला:--
पिताजी, क्या यहाँ से ही प्रियवदा और अनसुया - दोनो सखियाँ लौट जायेंगी ?
कण्व:--
बेटी, इन दोनों को भी देना है (अर्थात् इन दोनों का भी विवाह करना है) इनका वहाँ (हस्तिनापुर) जाना उचित नहीं है । तुम्हारे साथ गौतमी जायेगी ।
शकुन्तला:--
(पिता से लिपटकर) पिता की गोद से अलग होकर अब मैं मलय पर्वत के तट से उखाड़ी गयी चन्दन-लता की भांति, दूसरे देश में कैसे जीवन धारण करूंगी (अर्थात् वहाँ कैसे जाउंगी) ।
कण्व:--
बेटी, क्यो इस प्रकार व्यकुल (दुखी) हो रही हो ? हे बेटी, तुम उत्तम कुल में उत्पन्न (अपने) पति के प्रशंसनीय गृहिणी (महारानी) के पद पर प्रतिष्ठित होकर, उस (पति) के एश्वर्य (समृद्धि) के कारण महत्त्वपूर्ण कार्यो से प्रतिक्षण (सतत) व्यस्त रहती हुई और शीघ्र ही, पूर्व दिशा जिस प्रकार पवित्र सूर्य को जन्म देती है उसी प्रकार, पवित्र पुत्र को जन्म देकर मेरे विरह जनित शोक को नहीं गिनोगी (अर्थात् भूल जाओगी) ।