(शकुन्तला पिता के पैरों पर गिरती है)
कण्व:--
मैं तुम्हारे लिये जो चाहता हूं, वह (पूर्ण) हो।
शकुन्तला:--
(सखियों के पास जाकर) सखियों, तुम दोनों भी एक साथ ही मेरा अलिङ्गन करो ।
दोनों सखियाँ:--
(वैसा कर अर्थात् गले लगाकर) - सखी यदि वह राजा (तुम्हे) पहचानने में शिथिल हो (अर्थात् देर करे) तो उसके अपने नाम से अङ्कित यह अँगूठी (उसे) दिखा देना ।
शकुन्तला:--
मैं तुम्हारे इस संदेह से कांप गई हूँ ।
दोनों सखियाँ:--
डरो मेत । अत्यधिक प्रेम (अनुराग) पाप की शंका करने वाला होता है । (अर्थात् अत्यधिक स्नेह के कारणः अनिष्ट की आशङ्का हुआ करती है)
शाङ्गरव:--
सूर्य दूसरे पहर (युगांतर) में चढ़ गया है । (इसलिये) आदरणीय आप (शकुन्तला) शीघ्रता करें ।
शकुन्तला:--
(आश्रम की ओर मुख किये हुए खड़ी होकर) पिता जी, मैं फिर कब तपोवन को देखूंगी (अर्थात् आप मुझे फिर कब बुलाएंगे) ?
कण्व:--
सुनो ! बहुत दिनों तक चारों (समुद्र) तक फैली हुई पृथ्वी की सपत्नी (राजा दुष्यन्तं की पटरानी) होकर और अपने अद्वितीय महारथी दुष्यन्त से उत्पन्न पुत्र को (राज-सिंहासन पर) प्रतिष्ठित करा कर (बैठाकर) और उस (पुत्र) को कुटुम्ब का भार सौंपने वाले पति (दुष्यन्त) के साथ इस शान्त आश्रम में फिर (आकर) निवास करोगी ।
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