और भी - चन्द्रमा के अस्त हो जाने पर (छिप जाने पर) स्मरणीय (नष्ट) शोभा वाली (अर्थात् शोभाविहीन) होने से वही कुमुदिनी सम्प्रति मेरी दृष्टि को आनन्दित नहीं कर रही है । निश्चय ही स्त्री-समाज के लिये अपने इष्ट व्यक्ति के प्रवास से उत्पन्न दुःख अत्यन्त असह्य होते हैं ।
(बिना पर्दा उठाये हाथ से पर्दा हटाने के साथ प्रवेश करके)
अनसुया:--
यद्यपि (सांसारिक) विषयों से विमुख (हम जैसे) लोगों को यह (सब) ज्ञात नहीं है, तथापि (मेरी समझ से) उस राजा (दुष्यन्त) के द्वारा शकुन्तला के साथ (निश्चय ही) अशिष्ट (अभद्र) व्यवहार किया गया है।
शिष्य:--
तो (चलकर) गुरुजी से कहता हूँ कि हवन का समय हो गया है । (यह कह कर निकल जाता है) ।
अनसूया:--
जागी हुई भी (जाग कर भी) मैं क्या करूंगी ? (प्रातःकाल) के उचित (अभ्यस्त) करणीय कार्यों में भी मेरे हाथ-पैर नहीं फैल (चल) रहे हैं । कामदेव की इच्छा अब पूरी हो जिसने झूठी प्रतिज्ञा करने वाले व्यक्ति (दुष्यन्त) के प्रति शुद्ध हृदय वाली भोली-भाली सखी (शकुन्तला) को समर्पित (प्रेमासक्त) करा दिया । अथवा दुर्वासा का शाप (ही) यह अनर्थ (गड़बड़) करा रहा है । नहीं तो कैसे वे राजर्षि उस प्रकार की (प्रेमभरी) बातें कर इतने दिनों तक एक पत्र भी नहीं भेजते । अतः यहाँ से हम पहचान की अँगूठी उनके पास भेजते हैं । (अब समस्या यह है कि अँगूठी ले जाने के लिये) कष्ट सहने वाले (निरन्तर तपस्याजनित कष्ट झेलने वाले) तपस्वी लोगों में किससे प्रार्थना की जाए ? निश्चित ही सब दोष (अपराध) सखी (शकुन्तला) पर ही आयेगा । (कहने के लिये) उद्यत होकर भी (व्यवसिसताऽपि) मैं प्रवास से लोटे हुए पिता कण्व से, दुष्यन्त के साथ (गान्धर्व विधि से) शकुन्तला के विवाहित और गर्भिणी होने की बात नहीं कह सकती । (अर्थात् पिता कण्व को यह नहीं बता सकती कि शकुन्तला का दुष्यन्त के साथ गान्धर्व-विधि से विवाह हो गया है और वह गर्भिणी है) । ऐसी दशा में हमे क्या करना चाहिये ?
प्रियंवदा:--
(प्रवेश कर) (प्रसत्नतापूर्वक) सखी, शकुन्तला के प्रस्थान (विदाई) के मांगलिक कार्यों को पूरा करने के लिये शीघ्रता करो, शीघ्रता करो ।
अनसूया:--
सखी, यह कैसे ?
प्रियंवदा:--
सुनो । अभी सुखपूर्वक सोयी कि नहीं - यह पूछने की इच्छा से मैं शकुन्तला के पास गयी थी ।
अनसुया:--
तब, तब (क्या हुआ) ?
प्रियंवदा:--
तब लज्जा से झुके हुए मुख वाली इस (शकुन्तला) को गले लगाकर पिता कण्व के द्वारा इस प्रकार अभिनन्दन किया गया - 'सोभाग्य से धूयें से व्याकुल दृष्टि वाले भी यजमान की आहुति अग्नि में ही गिरी (पड़ी) है । बेटी, सुशिष्य को दी गयी विद्या की भाँति (तुम) अशोचनीय हो गयी हो (अर्थात् तुम्हारे विषय में मुझे अब कोई चिन्ता नहीं है) । आज ही ऋषियों से सुरक्षित तुमको पति (दुष्यन्त) के पास भेज रहा हूँ ।
अनसूया:--
तो किसके द्वारा पिता कण्व को (यह) समाचार बताया गया ?
प्रियंवदा:--
यज्ञशाला (अग्निशरण) में गये हुए (उनको) शरीर-रहित छन्दोमयी वाणी (आकाशवाणी) के द्वारा (यह समाचार) (बताया गया है) ।
अनसूया:--
(आश्चर्य के साथ) किस प्रकार ?
प्रियंवदा:--
(संस्कृत का आश्रय लेकर अर्थात् संस्कृत भाषा में) हे ब्राह्मण, दुष्यन्त के द्वारा स्थापित तेज (वीर्य, सन्तान) को, पृथ्वी के कल्याण के लिये धारण करने वाली पुत्री (शकुन्तला) को, अपने अन्दर अग्नि को धारण करने वाली शमीलता की भाँति समझो (जानो) ।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
अभिज्ञानशाकुन्तलम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
अभिज्ञानशाकुन्तलम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।