दोनों सखियाँ:--
सखी शकुन्तला, (तुम) प्रसाधन से परिपूर्ण हो गयी हो (अर्थात् तुम्हारा श्रृंगार (सजावट ) पूरा हो गया है) । अब (इन) दो रेशमी-वस्त्रों को पहन लो ।
(शकुन्तला उठकर पहनती है)
गौतमी:--
बेटी, आनन्द को प्रवाहित करने वाली दृष्टि से मानो (तुम्हें) गले लगाते हुये ये तुम्हारे पिता (गुरु) कण्व उपस्थित हैं । अतः शिष्टाचार का पालन करो ।
शकुन्तला:--
(लज्जा के साथ) पिताजी, मैं प्रणाम कर रही हूँ ।
कण्व:--
बेटी, शर्मिष्ठा (जिस प्रकार) ययाति की अत्यन्त प्रिय थी उसी प्रकार तुम भी (अपने) पति की अत्यन्त प्रिय होओ (बनो) और (शर्मिष्ठा) ने पूरू (नामक पुत्र) को (जैसे प्राप्त किया था) तुम भी (उसी प्रकार) सम्राट पुत्र को प्राप्त करो ।
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