प्रियवदा:--
(शकुन्तला को देखकर) सखी, (वनस्पतियों की) इस अनुकम्पा (अनुग्रह) से सूचित होता है कि तुम्हारे द्वारा पति के घर में राजलक्ष्मी अनुभव की जायेगी (अर्थात् तुम पति के घर में राजलक्ष्मी का भोग करोगी) ।
(शकुन्तला लज्जा का अभिनय करती है)
पहला:--
गौतम, आओ-आओ । स्नान कर लौटे हुये कण्व को वनस्पतियों की (इस) सेवा को बता दें।
दूसरा:--
ठीक है । (दोनों निकल जाते हैं) ।
दोनों सखियां:--
अरे, यह जन (शकुन्तला हमीं लोगों की भाँति) आभूषण का अनुपयोक्ता (उपयोग न करने वाला) है । (फिर भी) चित्रकला से प्राप्त परिचय (ज्ञान) के आधार पर हम तुम्हारे अंगों में आभूषण पहना देती है।
शकुन्तला:--
मैं तुम दोनों की (आभूषण पहनाने की) दक्षता को जानती हूँ ।
(दोनों अभिनय के साथ आभूषण पहनाती हैं । तत्पश्चात् स्नान कर लौटे हुए कण्व प्रवेश करते हैं ।)
कण्व:--
आज शकुन्तला (पति के घर) चली जायेगी, इसलिये (मेरा) हृदय उत्कण्ठा (तीव्र वेदना) से भर गया है । अवरुद्ध अश्रु-प्रवाह से कण्ठ रुध गया है (अर्थात् बहते हुए आंसुओं को रोकने से रुध गया हे) । (मेरी) दृष्टि चिन्ता के कारण जड़ (निश्चेष्ट) (हो गयी है) । (पुत्री शकुन्तला के प्रति) स्नेह के कारण मेरे जैसे वनवासी की ऐसी व्याकुलता (है तब) गृहस्थ लोग नये (पहली बार होने वाले) पुत्री के वियोग जनित दुख से क्यों न पीडित होते होंगे ? (चारों ओर घूमते हुए) ।
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