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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 4 • श्लोक 12
शकुन्तला- (स्मृत्वा) तात, लताभगिनीं वनज्योत्स्नां तावदामन्नयिष्ये । काश्यप-- अवैमि ते तस्यां सोदयस्निहम्‌ । इयं तावद्‌ दक्षिणेन । शकुन्तला- (उपेत्य लतामालिङ्गय्‌) वनज्योत्स्ने, चूतसङ्गताऽपि मां प्रत्यालिङ्गेतोगताभिः शाखाबाहुभिः । अद्यप्रभृति दूरपरिवर्तिनी ते खलु भविष्यामि । काश्यपः-कण्वसङ्कल्पितं प्रथममेव मया - तवार्थे भतरिमात्मसद्शं सुकृतैर्गता त्वम्‌ । चूतेन संश्रितवती नवमालिकेवमस्यामहं त्वयि च सम्प्रति वीतचिन्तः ।।
शकुन्तला:-- (याद करके) हे पिता जी, तो मैं अपनी लता-बहन वनज्योत्स्ना से विदाई ले लूं ? कण्व:-- मैं जानता हूँ कि तुम्हारा उस पर सगी बहन-सा प्रेम है । तो यह (वनज्योत्स्ना) दाहिनी ओर है । शकुन्तला:-- (पास जाकर लता को गले से लगाकर) वनज्योत्स्ना, (अपने पति) आम से लिपटी हुई भी इधर फ़ैली हुई शाखारूपी भुजाओं से मेरा आलिङ्गन कर लो (अर्थात्‌ मुझसे गले मिल लो) । आज से मैं तुमसे दूर हो जाऊंगी । कण्व:-- मैंने तुम्हारे लिये पहले से ही (जिसका) सङ्कल्प किया था । अपने अनुरूप (उस) पति को तुम (अपने) पुन्यों (भाग्य) से पा गयी हो। यह नवमालिका (भी) आम वृक्ष से मिल गयी है । अब मैं इसके और तुम्हारे विषय में चिन्ता से मुक्त (निश्चिन्त) हो गया हूं ।
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