शकुन्तला:--
(याद करके) हे पिता जी, तो मैं अपनी लता-बहन वनज्योत्स्ना से विदाई ले लूं ?
कण्व:--
मैं जानता हूँ कि तुम्हारा उस पर सगी बहन-सा प्रेम है । तो यह (वनज्योत्स्ना) दाहिनी ओर है ।
शकुन्तला:--
(पास जाकर लता को गले से लगाकर) वनज्योत्स्ना, (अपने पति) आम से लिपटी हुई भी इधर फ़ैली हुई शाखारूपी भुजाओं से मेरा आलिङ्गन कर लो (अर्थात् मुझसे गले मिल लो) । आज से मैं तुमसे दूर हो जाऊंगी ।
कण्व:--
मैंने तुम्हारे लिये पहले से ही (जिसका) सङ्कल्प किया था । अपने अनुरूप (उस) पति को तुम (अपने) पुन्यों (भाग्य) से पा गयी हो। यह नवमालिका (भी) आम वृक्ष से मिल गयी है । अब मैं इसके और तुम्हारे विषय में चिन्ता से मुक्त (निश्चिन्त) हो गया हूं ।
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