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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 4 • श्लोक 14
शकुन्तला-- वत्स, किं सहवासपरित्यागिनीं मामनुसरसि । अचिरप्रसूतया जनन्या | विना वर्धित एव । इदानीमपि मया विरहितं त्वां तातश्चिन्तयिष्यति । निवर्तस्व तावत्‌ । काश्यपः-- उत्यक्ष्मणोर्नययोरुपरुद्धवृत्ति वाष्यं कुरु स्थिरतया विरतानुबन्धम्‌ । अस्मिन्नलक्षितनतोन्नत भूमिभागे | मार्गे प्रदानि खलु ते विषमीभवन्ति।।
शकुन्तला:-- पुत्र ! साथ छोडकर जाने वाली मेरे पीछे क्यों आ रहे हो । जन्म देकर तत्काल (मरी हुई) माता के बिना (भी) तुम पाले ही गये हो । अब भी मुझसे वियुक्त (छोड़े गये) तुमको पिता जी पालेंगे । (रोती हुई प्रस्थान करती है) । कण्व:-- ऊपर की ओर उठी हुई बरौनियों वाले नेत्रों के व्यापार (दर्शनशक्ति) को रोकने वाले आंसुओं के प्रवाह को धर्यपूर्वक रोको । (क्योंकि) अदृश्य (दिखाई न पड़ने वाले) भूमिभाग वाले इस मार्ग में तुम्हारे पैर निश्चय ही लड़खडा रहे हैं ।
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