(सभी लोग आश्वर्यपूर्वक सुनते हैं)
गौतमी:--
बेटी, बन्धुजनो के समान प्रेम करने वाले तपोवन के देवताओं द्वारा तुम्हे (पतिगृह) जाने के लिये अनुमति (स्वीकृति) मिल गयी है । अतः देवताओं को प्रणाम करो ।
शकुन्तला:--
(प्रणाम करती हुई चारों ओर घूमकर । हाथ की ओट में) सखी प्रियंवदा, आर्यपुत्र (दुष्यन्त) के दर्शन के लिये उत्कण्ठित होने पर भी आश्रम-भूमि को छोड़ते हुए मेरे पैर दुख के साथ (कठिनाई से) आगे की ओर बढ़ रहे हैं ।
प्रियंवदा:--
केवल सखी (तुम शकुन्तला) ही तपोवन के वियोग से व्याकुल (दुखी) नहीं हो । तुम्हारे वियोग (विदाई) के समय उपस्थित होने के कारण तपोवन की भी (तुम्हारे) समान अवस्था दिखायी पड़ रही है । (तुम्हारे वियोग से दुखी) हरिणियों ने कुश के ग्रास (कवल) को उगल दिया है, मयूरो (मोरों) ने नाचना छोड दिया है और लताएँ पीले पत्तों को गिराकर (डालकर) मानो आंसुओं को बहा रही हैं ।
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