मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 4 • श्लोक 11
(सर्वे सविस्मयमाकर्णयन्ति) गौतमी- जाते, ज्ञातिजनस्निग्धाभिरनुज्ञातगमनाऽ सि तपोवनदेवताभिः । प्रणम भगवतीः । शकुन्तला-(सप्रणामं परिक्रम्य । जनान्तिकम्‌) हला प्रियवदे, आर्यपुत्रदरनोत्सुकाया अप्याश्रमपदं परित्यजन्त्या दुःखेन मे चरणौ पुरतः प्रवति । प्रियंवदा-न केवलं तपोवनविरहकातरा सख्येव । त्वयोपस्थितवियोगस्य तपोवनस्यापि तावत्‌ समवस्था दृश्यते । उद्रलितदर्भकवला मृग्यः परित्यक्तनर्तना मयुराः । अपसृतपाण्डुपत्रा मुञ्न्त्यश्रुणीव लताः ।।
(सभी लोग आश्वर्यपूर्वक सुनते हैं) गौतमी:-- बेटी, बन्धुजनो के समान प्रेम करने वाले तपोवन के देवताओं द्वारा तुम्हे (पतिगृह) जाने के लिये अनुमति (स्वीकृति) मिल गयी है । अतः देवताओं को प्रणाम करो । शकुन्तला:-- (प्रणाम करती हुई चारों ओर घूमकर । हाथ की ओट में) सखी प्रियंवदा, आर्यपुत्र (दुष्यन्त) के दर्शन के लिये उत्कण्ठित होने पर भी आश्रम-भूमि को छोड़ते हुए मेरे पैर दुख के साथ (कठिनाई से) आगे की ओर बढ़ रहे हैं । प्रियंवदा:-- केवल सखी (तुम शकुन्तला) ही तपोवन के वियोग से व्याकुल (दुखी) नहीं हो । तुम्हारे वियोग (विदाई) के समय उपस्थित होने के कारण तपोवन की भी (तुम्हारे) समान अवस्था दिखायी पड़ रही है । (तुम्हारे वियोग से दुखी) हरिणियों ने कुश के ग्रास (कवल) को उगल दिया है, मयूरो (मोरों) ने नाचना छोड दिया है और लताएँ पीले पत्तों को गिराकर (डालकर) मानो आंसुओं को बहा रही हैं ।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
अभिज्ञानशाकुन्तलम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

अभिज्ञानशाकुन्तलम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें