(तत्पश्चात् फूल चुनने का अभिनय करती हुयी दोनों सखियाँ प्रवेश करती हैं)
अनसुया:--
सखी प्रियंवदा, गन्धर्व (विवाह) विधि से सम्पन्न (विवाह रूप) कल्याण (मङ्गल कार्य) वाली शकुन्तला यद्यपि अपने योग्य पति से सङ्गत हो गयी है (अर्थात् अपने योग्य पति को पा गयी है) । इसलिये मेरा हदय आनन्दित (प्रसन्न) है, तथापि इतनी सी बात विचारणीय है ।
प्रियंवदा:--
कौन-सी ?
अनसूया:--
आज वह राजर्षि (दुष्यन्त) यज्ञ को समाप्त करने के बाद ऋषियों द्वारा विदा किये जाने पर (जब) अपने नगर में प्रवेश करेगा तब अन्तःपुर की स्त्रियों से मिलने के बाद यहाँ के वृतान्त (विवाह आदि की बात) को याद करेगा या नहीं ?
प्रियंवदा:--
विश्वस्त (निश्चिन्त) रहो । उस प्रकार की विशिष्ट (सुन्दर) आकृतियां गुणों से रहित नहीं होती हैं । पिता (कण्व) इस समाचार को सुनकर न जाने क्या करेंगे ? (अर्थात् शकुन्तला के गान्धर्व विवाह का अनुमोदन करेंगे, अथवा नहीं - यह बात विचारणीय है )
अनसूया:--
जैसा मैं समझती हूँ, वैसा (यह) उनको अनुमत (स्वीकृत) होगा (अर्थात् वे इस विवाह का अनुमोदन कर देगें) ।
प्रियंवदा:--
कैसे ?
अनसूया:--
गुणवान् व्यक्ति को कन्या देनी चाहिये - यह (माता-पिता का) पहला सङ्कल्प (दृढ विचार) होता है । उसको यदि भाग्य ही सम्पन्न (पुरा) कर देता है, तब तो गुरुजन (माता-पिता) बिना प्रयास के ही कृतकृत्य हो गये ।
प्रियंवदा:--
(पुष्पों के पात्र (टोकरी) को देखकर) सखी, पूजा-कार्य (बलिकर्म) के लिये पर्याप्त पुष्प चुन लिये गये ।
अनसूया:--
किन्तु सखी शकुन्तला के सोभाग्य (विवाह) देवता की पूजा करनी है ।
प्रियंवदा:--
ठीक है । (फिर उसी कार्य (अर्थात् पुष्प चुनने) का अभिनय करती है) ।
(नेपथ्य में) यह मैं (आया) हूँ ।
अनसूया:--
सखी, (किसी) अतिथि का वचन (कथन) है (अर्थात् ऐसा लग रहा है कि कोई अतिथि पुकार रहा है)।
प्रियंवदा:--
शकुन्तला तो कुटी पर उपस्थित है ही ।
अनसुया:--
किन्तु आज (वह) हदय से अनुपस्थित है (अर्थात् आज उसका मन कहीं अन्यत्र लगा है) | इतने ही पुष्य (पूजा के लिये) पर्याप्त हैं । (दोनो चल देती हैं)।
(नेपथ्य में) अरे, अतिथि का तिरस्कार करने वाली, एकाग्रचित्तवाली (किसी व्यक्ति विशेष पर आसक्त चित्तवाली) जिसका चिन्तन करती हुई (यहाँ) उपस्थित मुझ तपस्वी को नहीं जान (देख) पा रही हो, वह (तेरे द्वारा) स्मरण दिलाये जाने पर भी तुमको (उसी प्रकार) स्मरण नहीं करेगा (जिस प्रकार) उन्मत्त (व्यक्ति) पहले की गयी (कही गयी) बात को (स्मरण नहीं करता है) ।
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