अथवा गौतमी (इस विषय में) क्या सोचती (मानती) है (अर्थात् गोतमी का क्या मत है ?) ।
गौतमी:--
इतना उपदेश वधुओं (नव विवाहित युवतियों) के लिये (पर्याप्त) है । बेटी, यह सब अवश्य ही (भली-भांति) याद रखना ।
कण्व:--
बेटी, मुझसे और (अपनी) सखियों से गले मिल लो ।
शकुन्ला:--
पिताजी, क्या यहाँ से ही प्रियवदा और अनसुया - दोनो सखियाँ लौट जायेंगी ?
कण्व:--
बेटी, इन दोनों को भी देना है (अर्थात् इन दोनों का भी विवाह करना है) इनका वहाँ (हस्तिनापुर) जाना उचित नहीं है । तुम्हारे साथ गौतमी जायेगी ।
शकुन्तला:--
(पिता से लिपटकर) पिता की गोद से अलग होकर अब मैं मलय पर्वत के तट से उखाड़ी गयी चन्दन-लता की भांति, दूसरे देश में कैसे जीवन धारण करूंगी (अर्थात् वहाँ कैसे जाउंगी) ।
कण्व:--
बेटी, क्यो इस प्रकार व्यकुल (दुखी) हो रही हो ? हे बेटी, तुम उत्तम कुल में उत्पन्न (अपने) पति के प्रशंसनीय गृहिणी (महारानी) के पद पर प्रतिष्ठित होकर, उस (पति) के एश्वर्य (समृद्धि) के कारण महत्त्वपूर्ण कार्यो से प्रतिक्षण (सतत) व्यस्त रहती हुई और शीघ्र ही, पूर्व दिशा जिस प्रकार पवित्र सूर्य को जन्म देती है उसी प्रकार, पवित्र पुत्र को जन्म देकर मेरे विरह जनित शोक को नहीं गिनोगी (अर्थात् भूल जाओगी) ।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
अभिज्ञानशाकुन्तलम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
अभिज्ञानशाकुन्तलम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।