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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 4 • श्लोक 18
कथं वा गौतमी मन्यते । गौतमी-- एतावान्‌ वधूजनस्योपदेशः । जाते, एतत्‌ खलु सर्वमवधारय । काश्यपः-- वत्से, परिष्वजस्व मां सखीजनं च । शकुन्तला-- तात , इत एव किं प्रियंवदाऽनसूये सख्यौ निवर्तिष्येते ? काश्यपः-- वत्से, इमे अपि प्रदेये । न युक्तमनंयोस्तत्रं गन्तुम्‌ । त्वया सह गौतमी ` यास्यति । शकुन्तला--(पितरमारिलष्य). कथमिदानीं तातस्याङ्कात्‌ परिभ्रष्टा मलयतटोन्मूलिता ` चन्दनलतेव देशान्तरे जीवितं धारयिष्यामि । काश्यपः--वत्से, किमेव. कात्राऽसि । अभिजनवतो भर्तुः श्लोष्ये स्थिता - गृहिणीपदे विभवगुरुभिः कृत्यैस्तस्य प्रतिक्षणमाकुला । तनयमचिरात्‌ प्राचीवार्कं प्रसूय च पावनं ॥ मम विरहजां न त्व वत्से-शुच गणायिष्यसि ।।
अथवा गौतमी (इस विषय में) क्या सोचती (मानती) है (अर्थात्‌ गोतमी का क्या मत है ?) । गौतमी:-- इतना उपदेश वधुओं (नव विवाहित युवतियों) के लिये (पर्याप्त) है । बेटी, यह सब अवश्य ही (भली-भांति) याद रखना । कण्व:-- बेटी, मुझसे और (अपनी) सखियों से गले मिल लो । शकुन्ला:-- पिताजी, क्या यहाँ से ही प्रियवदा और अनसुया - दोनो सखियाँ लौट जायेंगी ? कण्व:-- बेटी, इन दोनों को भी देना है (अर्थात्‌ इन दोनों का भी विवाह करना है) इनका वहाँ (हस्तिनापुर) जाना उचित नहीं है । तुम्हारे साथ गौतमी जायेगी । शकुन्तला:-- (पिता से लिपटकर) पिता की गोद से अलग होकर अब मैं मलय पर्वत के तट से उखाड़ी गयी चन्दन-लता की भांति, दूसरे देश में कैसे जीवन धारण करूंगी (अर्थात्‌ वहाँ कैसे जाउंगी) । कण्व:-- बेटी, क्यो इस प्रकार व्यकुल (दुखी) हो रही हो ? हे बेटी, तुम उत्तम कुल में उत्पन्न (अपने) पति के प्रशंसनीय गृहिणी (महारानी) के पद पर प्रतिष्ठित होकर, उस (पति) के एश्वर्य (समृद्धि) के कारण महत्त्वपूर्ण कार्यो से प्रतिक्षण (सतत) व्यस्त रहती हुई और शीघ्र ही, पूर्व दिशा जिस प्रकार पवित्र सूर्य को जन्म देती है उसी प्रकार, पवित्र पुत्र को जन्म देकर मेरे विरह जनित शोक को नहीं गिनोगी (अर्थात्‌ भूल जाओगी) ।
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