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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 4 • श्लोक 20
गौतमी-- जाते, परिहीयते गमनवेला । निवर्तय पितरम्‌ । अथवा चिरेणापि पुनः पुनरेषैवं मन्रविष्यते । निवर्ततां भवान्‌ । काश्यपः-- वत्से, उपरुध्यते तपोऽनुष्ठानम्‌ । शकुन्तला (भूयः पितरमारिलष्य) तपश्चरणयपीडितं तात्टारीरम्‌ । तन्माऽ तिमात्र मम कृत. उत्कण्ठस्व । काश्यपः- (सनिःश्वासम्‌) -- शममेष्यति मम शोकः कथं नु वत्से त्वया रचितपूर्वम्‌ । उटजद्वारविरूढं नीवारबलिं विलोकयतः ।। गच्छ । शिवास्ते पन्थानः सन्तु । (निष्क्रान्ता शकुन्तला सहयायिनश्च) सख्यौ-(श्कान्तलां विलोक्य) हा धिक्‌, हा धिक्‌ । अन्तर्हिता शकुन्तला वनराज्या । काश्यपः (सनिःध्ासम्‌) अनसूये, गतवती वां सहचारिणी । निगृह्य शोकमनुगच्छतं मां प्रस्थितम्‌ । उभे-- तात, शकुन्तलाविरहितं शून्यमिव तपोवनं कथं प्रविशति । काश्यपः- स्नेहप्रवृ्तिरेवद्शिनी । (सविमर्श परिक्रम्य) हन्त भोः शकुन्तलां पतिकुलं विसुज्य लब्धमिदानीं स्वास्थ्यम्‌ । कुतः-- अर्थो हि कन्या परकीय एव तामद्य सम्प्रेष्य परिग्रहीतुः । जातो ममाय विशदः प्रकामं प्रत्यर्पितन्यास इवान्तरात्मा ।। (इति निष्क्रान्ताः सर्वे) ।। इति चतुर्थोऽ इः ।।
गौतमी:-- पुत्री, जाने का समय बीत रहा है । (इसलिये) पिता जी को लौटाओ । अथवा यह (शकुन्तला) बहुत देर तक बार-बार इसी प्रकार कहती रहेगी । (इसलिये अब) आप (ही) लौट जाइये । कण्व:-- बेटी, (मेरी) तपस्या का अनुष्ठान रुक रहा है (इसलिये) मुझे जाने दो । शकुन्तला:-- (पुनः पिता से लिपटकर) पिता जी का (अर्थात्‌ आप का) शरीर तपस्या के आचरण से (अत्यन्त) कृश (पीड़ित) है । इसलिये मेरे लिये आप अत्यधिक दुखी मत होये । कण्व:-- (उच्छवास लेते हये) बेटी ! तुम्हारे द्वारा पहले (भूतबलि के रूप में) बनाये गये (पक्षियों आदि के खाने के लिये डाले (बिखेरे गये) (और अब कुटी के द्वार पर उगे हुये) नीवार (जङ्गली धान) को देखते हुये मेरा शोक कैसे शान्ति को प्राप्त होगा ? जाओ । तुम्हारा मार्ग मङ्गलमय हो । (शकुन्तला और उसके साथ जाने वाले लोग निकल जाते हैं) । दोनों सखि्यां:-- (शकुन्तला को देखकर) हाय कष्ट है, हाय कष्ट हे, शकुन्तला वृक्षों (वन) की पंक्ति से ओझल हो गयी । कण्व:-- (ऊंची सांस लेते हुये) अनसूया, तुम लोगों की सखी चली गयी । तुम लोग अपने शोक को रोककर (आश्रम की ओर) प्रस्थान करने वाले मेरा अनुगमन करो (मेरे पीछे-पीछे आओ) । दोनों:-- पिता जी, शकुन्तला से रहित (इस) सूने से तपोवन में हम कैसे प्रवेश करें । कण्व:-- प्रेम प्रवाह (भाव) इसी प्रकार दिखाने वाला होता है (अर्थात्‌ प्रेम के आधिक्य के कारण व्यक्ति को ऐसा ही अनुभव होता है) । (विचार-मग्न चारों ओर घूमकर) अहा! शकुन्तला को पति के घर (अर्थात्‌ ससुराल) भेजकर अब (मुझे) निश्चिंतता (मानसिक शान्ति) प्राप्त हुई । क्योकि कन्या (लडकी) वस्तुतः दूसरे का ही धन है । आज उस (कन्या) को पति के (पास) भेजकर मेरा यह अन्तःकरण उसी प्रकार अत्यन्त प्रसन्न हो गया है, जिस प्रकार धरोहर लोटा देने वाले व्यक्ति (का अन्तःकरण अति प्रसन्न) (निश्चिन्त) हो जाता है । (सभी निकल जाते हैं) ।। चतुर्थ अंक समाप्त ।।
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