गौतमी:--
पुत्री, जाने का समय बीत रहा है । (इसलिये) पिता जी को लौटाओ । अथवा यह (शकुन्तला) बहुत देर तक बार-बार इसी प्रकार कहती रहेगी । (इसलिये अब) आप (ही) लौट जाइये ।
कण्व:--
बेटी, (मेरी) तपस्या का अनुष्ठान रुक रहा है (इसलिये) मुझे जाने दो ।
शकुन्तला:--
(पुनः पिता से लिपटकर) पिता जी का (अर्थात् आप का) शरीर तपस्या के आचरण से (अत्यन्त) कृश (पीड़ित) है । इसलिये मेरे लिये आप अत्यधिक दुखी मत होये ।
कण्व:--
(उच्छवास लेते हये) बेटी ! तुम्हारे द्वारा पहले (भूतबलि के रूप में) बनाये गये (पक्षियों आदि के खाने के लिये डाले (बिखेरे गये) (और अब कुटी के द्वार पर उगे हुये) नीवार (जङ्गली धान) को देखते हुये मेरा शोक कैसे शान्ति को प्राप्त होगा ? जाओ । तुम्हारा मार्ग मङ्गलमय हो ।
(शकुन्तला और उसके साथ जाने वाले लोग निकल जाते हैं) ।
दोनों सखि्यां:--
(शकुन्तला को देखकर) हाय कष्ट है, हाय कष्ट हे, शकुन्तला वृक्षों (वन) की पंक्ति से ओझल हो गयी ।
कण्व:--
(ऊंची सांस लेते हुये) अनसूया, तुम लोगों की सखी चली गयी । तुम लोग अपने शोक को रोककर (आश्रम की ओर) प्रस्थान करने वाले मेरा अनुगमन करो (मेरे पीछे-पीछे आओ) ।
दोनों:--
पिता जी, शकुन्तला से रहित (इस) सूने से तपोवन में हम कैसे प्रवेश करें ।
कण्व:--
प्रेम प्रवाह (भाव) इसी प्रकार दिखाने वाला होता है (अर्थात् प्रेम के आधिक्य के कारण व्यक्ति को ऐसा ही अनुभव होता है) । (विचार-मग्न चारों ओर घूमकर) अहा! शकुन्तला को पति के घर (अर्थात् ससुराल) भेजकर अब (मुझे) निश्चिंतता (मानसिक शान्ति) प्राप्त हुई । क्योकि कन्या (लडकी) वस्तुतः दूसरे का ही धन है । आज उस (कन्या) को पति के (पास) भेजकर मेरा यह अन्तःकरण उसी प्रकार अत्यन्त प्रसन्न हो गया है, जिस प्रकार धरोहर लोटा देने वाले व्यक्ति (का अन्तःकरण अति प्रसन्न) (निश्चिन्त) हो जाता है ।
(सभी निकल जाते हैं)
।। चतुर्थ अंक समाप्त ।।
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