प्रियवदा:--
हाय धिक्कार है, हाय धिक्कार है । अनर्थ (अप्रिय) ही हो गया । किसी पूजनीय व्यक्ति के प्रति (दुष्यन्त के चिन्तन में आसक्त होने के कारण) शून्य हृदयवाली शकुन्तला ने अपराध कर दिया है । (सामने देखकर) जिस किसी (साधारण व्यक्ति) के प्रति ही (अपराध नहीं किया) । ये सहजतः क्रुद्ध हो जाने वाले महर्षि दुर्वासा हैं । इस प्रकार (शकुन्तला को) शाप देकर वेग के बल से युक्त (अर्थात् अत्यन्त तीव्र) और दुर्निवार्य गति से लौटे जा रहे हैं ।
अनसुया:--
अग्नि के अतिरिक्त और कौन जलाने मे समर्थ हो सकता है । जाओ (उनके) चरणों में प्रणाम कर (पैरों पर गिरकर) इन्हे लोटा लाओ, जब तक मैं अर्घ और जल (पूजा का सामान) तैयार करती हूँ ।
प्रियंवदा:--
(जैसा तुम कहती हो) वैसा (करती हूँ) । (यह कहकर निकल जाती है) ।
अनसूया:--
(कुछ पग चलने के बाद गिरने का अभिनय कर) ओह, आवेग (घबराहट) से लडखडाती हुई चाल के कारण मेरे हाथ से फूल का पात्र (डलिया) गिर गया । (फूलों के उठाने का अभिनय करती है) ।
प्रियंवदा:--
(प्रवेश करके) सखी, स्वभाव से टेड़े वे (महर्षि दुर्वासा) किसकी प्रार्थना को स्वीकार करते (मानते) हैं ? फिर भी (मैंने उन्हें) कुछ दयायुक्त कर लिया ।
अनसूया:--
(मुस्कराते हए) उस (दुर्वासा) के विषय में इतना भी बहुत है । बताओ (क्या हुआ) ?
प्रियवदा:--
जब लौटने की इच्छा नही किये (अर्थात् लौटने को तैयार नहीं हुए) तब मैने उनसे प्रार्थना की - "भगवन् तप के प्रभाव को न जानने वाली पुत्रीजन (शकुन्तला) का यह पहला अपराध है - (यह समझकर) आप के द्वारा उसका यह एक अपराध क्षन्तव्य है (ये क्षमा कर दीजिये) ।
अनसुया:--
तब, तब (क्या हआ) ?
प्रियवदा:--
तब मेरा वचन असत्य (अन्यथा) नहीं हो सकता, किन्तु पहचान (अभिज्ञान) के आभुषण को दिखाने से शाप समाप्त हो जायेगा - यह कहते, हुए ही (वे) अदृश्य (अनःर्हित) हो गये ।
अनसुया:--
अब (हम लोग) धैर्य-धारण के लिये समर्थ हैं (अर्थात् अब हम धैर्य रख सकती हैं) । (अपनी राजधानी को) जाते हुए - उस राजर्षि ने अपने नाम से अंकित अंगूठी स्मृति-चिन्ह के रूप में (शकुन्तला कीः उंगली में) स्वयं पहनायी थी । शकुन्तला उस (अंगूठी) से स्वतन्त्रः उपाय वाली होगी (अर्थात् उस अंगूठी से शकुन्तला शाप-मुक्त देने से पहचान ली जायेगी)।
प्रियवदा:--
सखी आओ । तब तक देवकार्य (देव-पूजन) सम्पन्न कर लें । (दोनों घूमती हैं) ।
प्रियंवदा:--
(देखकर) अनसूया, देखो तो । बायें हाथ पर मुंह रक्खी हई प्रिय सखी (शकुन्तला) चित्रित-सी (बैठी हुई) है । पति सम्बन्धी चिन्ता से उसे अपनी भी सुध नहीं है (अर्थात् अपने को भी भूल गयी है) । फिर अतिथि की (बात ही) क्या ?
अनसूया:--
प्रियंवदा, यह समाचार हम दोनों के मुख तक ही (सीमित) रहे । निश्चय ही स्वभाव से कोमल प्रियसखी (शकुन्तला) की रक्षा करनी चाहिये ।
प्रियंवदा:--
भला कौन नवमालिका (चमेली) को गर्म जल से सींचता है - सींचेगा (अर्थात् कोई नहीं) । (दोनो निकल जाती हैं) ।
॥ विष्कम्भक समाप्त ॥
(तत्पश्चात् सोकर उठा हुआ शिष्य प्रवेश करता है)
शिष्य:--
प्रवास से लौटे हुए आदरणीय कण्व के दवारा समय को जानने के लिये मुझे आदेश दिया गया है । तो प्रकाश में निकलकर देखता हूँ कि रात का कितना (भाग) शेष है । (चारों ओर घुमकर और देखकर) प्रातःकाल हो गया .है । क्योकि एक ओर वनस्पतियों का स्वामी (चन्द्रमा) अस्ताचल के शिखर की ओर जा रहा है (अर्थात् अस्त हो रहा है) । (और) एक ओर (दूसरी ओर) अरुण (नामक अपने सारथि) को आगे किये हुए सूर्य प्रकट (उदित) हो रहा है । (इस प्रकार यह) संसार दो तेजों (चन्द्रमा और सूर्य) के एक साथ अस्त एवं उदित होने से अपनी अवस्थाओं (दशाओं) के परिवर्तित होने के विषय में मानों नियन्त (नियमित) किया जा रहा है (अर्थात् संसार को अपरिहार्य उत्थानपतन के विषय में बताया जा रहा है) ।
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