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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 4 • श्लोक 7
गौतमी-- भगवन्‌ , वरः खल्वेषः । नाशीः । काश्यप-- वत्से, इतः सद्यो हुतानग्नीन्‌ प्रदक्चिणीकुरुष्व । काश्यपः-(ऋक्छन्दसाऽऽशास्ते) वत्से, अमी वेदि परितः क्लप्तधृष्ण्याः समिद्रन्तः प्रान्तसंस्तीर्णदर्भाः । अपघ्नन्तो दुरितं हव्यगन्धैर्वेतानास्त्वां वहयः पावयन्तु ।।
गौतमी:-- भगवान्‌ , निश्चय ही यह वरदान है, (केवल) आशीर्वाद ही नहीं । कण्व:-- बेटी, अभी हवन की गयी अग्नि की इधर से प्रदक्षिणा करो । (सभी प्रदक्षिणा करते हैं) । कण्व:-- (ऋग्वेद के छन्द में निर्मित श्लोक से आशीर्वाद देते हैं) बेटी, वेदी के चारों ओर स्थापित की गयी समिधाओं (लकडियों) से युक्त (प्रज्वलित) और किनारे-किनारे बिछे हुये कुशो से युक्त यज्ञ की अग्नियाँ हवन की गयी वस्तुओं (हति) की सुगन्ध से पाप को दूर करती हुई तुम (शकुन्तला) को पवित्र करे ।
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