गौतमी:--
भगवान् , निश्चय ही यह वरदान है, (केवल) आशीर्वाद ही नहीं ।
कण्व:--
बेटी, अभी हवन की गयी अग्नि की इधर से प्रदक्षिणा करो । (सभी प्रदक्षिणा करते हैं) ।
कण्व:--
(ऋग्वेद के छन्द में निर्मित श्लोक से आशीर्वाद देते हैं) बेटी, वेदी के चारों ओर स्थापित की गयी समिधाओं (लकडियों) से युक्त (प्रज्वलित) और किनारे-किनारे बिछे हुये कुशो से युक्त यज्ञ की अग्नियाँ हवन की गयी वस्तुओं (हति) की सुगन्ध से पाप को दूर करती हुई तुम (शकुन्तला) को पवित्र करे ।
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