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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 4 • श्लोक 10
(आकाशे) रम्यान्तरः कमलिनीहरितैः सरोभिश्छायादुमैर्नियमितार्कमयूखतापः । भूयात्‌ कुशेशयरजोमृदुरेणुरस्याः शान्तानुकूलपवनश्च शिवश्च पन्थाः ।।
(आकाश में) इस (शकुन्तला) का मार्ग कमलिनियों से हरे-भरे तालाब के द्वारा रमणीय (मनोहर) मध्यभाग वाला (हो) । छाया वाले वृक्षों से नियन्त्रित सूर्य की किरणों के ताप वाला हो । कमलों के पराग से कोमल धूलि युक्त शान्त और अनुकूल वायु वाला एवं कल्याणकारी हो ।
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