शाङ्गरवः- (मैने आप का) सन्देश ग्रहण कर लिया ( अर्थात् समझ लिया) ।
कण्व:--
बेटी, अब तुम्हे (भी) कुछ शिक्षा देनी है । वनवासी होते हुये भी हम लोग लोकव्यवहार को जानने वाले हैं ।
शाङ्गरव:--
वस्तुतः बुद्धिमानों को कुछ भी अज्ञात नहीं है ।
कण्व:--
तुम यहां से पतिगृह को पहुंचकर गुरुजनों (बड़ो) की सेवा करना, सपत्नियों (सोतों) के साथ प्रियसखी जैसा व्यवहार करना, तिरस्कृत होने पर भी क्रोधवश पति के प्रतिकूल आचरण न करना, सेवकसेविकाओं के प्रति अत्यधिक उदार रहना और (अपने) अच्छे भाग्य पर निरभिमान (होना) (अर्थात् गर्व मत करना) । इस प्रकार (आचरण करने वाली) युवतियां गृहिणी (गृहलक्ष्मी) के पद को प्राप्त करती हैं और इसके प्रतिकूल आचरण करने वाली (युवतियां) कुल के लिये व्याधि (विपत्ति का कारण) बनती हैं ।
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