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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 4 • श्लोक 17
शाङ्गरवः-- गृहीतः सन्देशः । काश्यपः- वत्से, त्वमिदानीमनुशासनीयाऽ सि । वनौकसोऽपि सन्तो लौकिकज्ञा वयम्‌ । शाङ्गरवः- न खलु धीमतां कश्चिदविषयो नाम । काश्यपः- सा त्वमितः पतिकुलं प्राप्य-- शुश्रूषस्व गुरून्‌ कुरु ` प्रियसखीवृत्ति सपत्नीजने भर्तर्विप्रकृताऽपि रोषणतया मा स्म प्रतीपं गमः। भूयिष्ठं भव दक्षिणा परिजने भाग्येष्वनुत्सेकिनी यान्त्येवं गृहिणीपदं युवतयो वामाः कुलस्याधयः ।।
शाङ्गरवः- (मैने आप का) सन्देश ग्रहण कर लिया ( अर्थात्‌ समझ लिया) । कण्व:-- बेटी, अब तुम्हे (भी) कुछ शिक्षा देनी है । वनवासी होते हुये भी हम लोग लोकव्यवहार को जानने वाले हैं । शाङ्गरव:-- वस्तुतः बुद्धिमानों को कुछ भी अज्ञात नहीं है । कण्व:-- तुम यहां से पतिगृह को पहुंचकर गुरुजनों (बड़ो) की सेवा करना, सपत्नियों (सोतों) के साथ प्रियसखी जैसा व्यवहार करना, तिरस्कृत होने पर भी क्रोधवश पति के प्रतिकूल आचरण न करना, सेवकसेविकाओं के प्रति अत्यधिक उदार रहना और (अपने) अच्छे भाग्य पर निरभिमान (होना) (अर्थात्‌ गर्व मत करना) । इस प्रकार (आचरण करने वाली) युवतियां गृहिणी (गृहलक्ष्मी) के पद को प्राप्त करती हैं और इसके प्रतिकूल आचरण करने वाली (युवतियां) कुल के लिये व्याधि (विपत्ति का कारण) बनती हैं ।
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