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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 4 • श्लोक 15
शाङ्गरवः-- भगवन्‌, ओदकान्तं स्निग्धो जनोऽनुगन्तव्य इति श्रूयते । तदिदं सरस्तीरम्‌ । अत्र सन्दिश्य प्रतिगन्तुमर्हति । काश्यपः- तेन हीमां क्षीरवृश्चच्छायामाश्रयापः । (सर्वे परिक्रम्य स्थिताः) । काश्यपः- (आत्मगतम्‌) कि नु खलु तत्रभवतो दुष्यन्तस्य युक्तरूपमस्माभिः सन्देष्टव्यम्‌ ॥ (इति चिन्तयति) । शकुन्तला- (जनान्तिकम्‌) हला, पश्य । नलिनीपत्रान्तरितमपि सहचरमपश्यन्त्यातुरा चक्रवाक्यारटति, दुष्करमहं करोमीति । अनसूया- सखी, मैवं मन्यस्व । एषापि प्रियेण बिना गमयति रजनीं विषाददीर्घतराम्‌ । गुर्वपि विरहदुःखमाशाबन्धः साहयति ।।
शाङ्गरवः-- भगवन्‌ , (यात्रा के समय) प्रिय व्यक्ति का जलाशय तक अनुगमन करना चाहिये - ऐसा सुना जाता है । तो यह सरोवर का तट है । यहाँ (दुष्यन्त से कहने के लिये हम लोगों को अपना) सन्देश देकर आप लौट जायें । कण्व:-- तो हम लोग इस दूध वाले (बरगद या पीपल) वृक्ष की छाया का आश्रय लें (छाया मे रुकें) । (सभी लोग धूमकर रुक जाते हैं) । कण्व:-- (अपने मन में) हमें माननीय दुष्यन्त के लिये अधिक उचित क्या सन्देश भेजना चाहिये । (सोचते हैं) । शकुन्तला:-- (हाथ की ओट में) सखी, देखो । कमलिनी के पत्ते की ओट में छुपे हुये भी (अपने) साथी (चकवे) को न देखने से व्याकुल यह चकवी चिल्ला रही है । (इससे मुझे लग रहा है कि) मैं दुष्कर-कार्य कर रही हूँ (क्योकि अपने प्रियतम से इतनी दूर होने पर भी मुझे कुछ नहीं हो रहा है) । अनसुया:-- सखी, ऐसा मत कहो । यह (चकवी) भी (अपने) प्रिय (चकवे) के बिना दुख के कारण (अत्यधिक) लम्बी (प्रतीत होने वाली) रात को बिताती है । आशा का बन्धन महान्‌ (बड़े से बड़े) वियोग के दुख को सहन करा देता है ।
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