शाङ्गरवः--
भगवन् , (यात्रा के समय) प्रिय व्यक्ति का जलाशय तक अनुगमन करना चाहिये - ऐसा सुना जाता है । तो यह सरोवर का तट है । यहाँ (दुष्यन्त से कहने के लिये हम लोगों को अपना) सन्देश देकर आप लौट जायें ।
कण्व:--
तो हम लोग इस दूध वाले (बरगद या पीपल) वृक्ष की छाया का आश्रय लें (छाया मे रुकें) । (सभी लोग धूमकर रुक जाते हैं) ।
कण्व:--
(अपने मन में) हमें माननीय दुष्यन्त के लिये अधिक उचित क्या सन्देश भेजना चाहिये । (सोचते हैं) ।
शकुन्तला:--
(हाथ की ओट में) सखी, देखो । कमलिनी के पत्ते की ओट में छुपे हुये भी (अपने) साथी (चकवे) को न देखने से व्याकुल यह चकवी चिल्ला रही है । (इससे मुझे लग रहा है कि) मैं दुष्कर-कार्य कर रही हूँ (क्योकि अपने प्रियतम से इतनी दूर होने पर भी मुझे कुछ नहीं हो रहा है) ।
अनसुया:--
सखी, ऐसा मत कहो । यह (चकवी) भी (अपने) प्रिय (चकवे) के बिना दुख के कारण (अत्यधिक) लम्बी (प्रतीत होने वाली) रात को बिताती है । आशा का बन्धन महान् (बड़े से बड़े) वियोग के दुख को सहन करा देता है ।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
अभिज्ञानशाकुन्तलम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
अभिज्ञानशाकुन्तलम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।