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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 4 • श्लोक 13
इतः पन्थानं प्रतिपद्यस्व । शकुन्तला-(सख्यो प्रति) हला, एषा द्वयोर्युवयोर्हस्ते निक्षेपः । संख्यौ- अयं जनः कस्य हस्ते समर्पितः । काश्यपः-- अनसूये, अलं रुदित्वा । ननु भवतीभ्यामेव स्थिरीकर्तव्या शकुन्तला । (सर्वे परिक्रामन्ति) । शकुन्तला-- तात, एषोटजपर्यन्तचारिणी गर्भमन्थरा मृगवधूर्यदाऽनघप्रसवा भवति, तदा मह्यं कमपि प्रियनिवेदयितृकं विसर्जयिष्यथ । काश्यपः- नेदं विस्मरिष्यामः । शकुन्तला-(गतिधद्गं रूपयित्वा) को न खल्वेष निवसने मे सज्जते ? (इति परावर्तते) । कार्यपः- वत्से, यस त्वया व्रणविरोपणमिङ्गृदीनां तैलं न्यषिच्यत मुखे कुशसूचिविद्धे । श्यामाकमुष्टिपरिवर्धितको जहाति सोऽयं न पुत्रकृतकः पदवीं मृगस्ते ।। ९१४ ।।
इधर से मार्ग पर आ जाओ । शकुन्तला:-- (दोनों सखियों से) सखियो, यह (लता) तुम दोनों के हाथ में (मेरी) धरोहर (निक्षेप) है । दोनों सखियां:-- यह जन किसके हाथ में सौम्पा जा रहा है (अर्थात्‌ हम दोनों को किसके हाथ में सोप रही हो) । (दोनों ओंसू बहाती हैं) । कण्व:-- अनसूया, रोओ मत । आप दोनों द्वारा शकुन्तला को धैर्य बंधाना चाहिये । (सभी लोग चारों ओर घुमते हैं) । शकुन्तला:-- हे पिता जी, कुटी के समीप विचरण करने वाली (और) गर्भ के कारण मन्द गति वाली यह हरिणी (मृगवधू) जब निर्विष्न (सकुशल) बच्चा पैदा करेगी तो (इस) प्रिय समाचार की सूचना देने वाले किसी व्यक्ति को मेरे पास भेजियेगा । कण्व:-- इस (बात) को नहीं भूलूंगा । शकुन्तला:-- (चलने में रुकावट का अभिनय कर) यह कौन मेरे वस्त्र में लिपट रहा है ? (पीछे मुडती है) । कण्व:-- बेटी, जिसके कुशो के अग्रभाग (नोंक) से बिंधे हुये मुख में तुम्हे द्वारा घावों को भरने वाला इङ्गुदी (हिङ्गोट) का तेल लगाया गया था, वही यह सांवा की मुठ्ठियों (ग्रासो) को खिलाकर बड़ा किया गया (पाला गया) और (तुम्हारे द्वारा) पुत्र की भाँति माना गया हरिण तुम्हारे मार्ग को नहीं छोड़ रहा है ।
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