इधर से मार्ग पर आ जाओ ।
शकुन्तला:--
(दोनों सखियों से) सखियो, यह (लता) तुम दोनों के हाथ में (मेरी) धरोहर (निक्षेप) है ।
दोनों सखियां:--
यह जन किसके हाथ में सौम्पा जा रहा है (अर्थात् हम दोनों को किसके हाथ में सोप रही हो) । (दोनों ओंसू बहाती हैं) ।
कण्व:--
अनसूया, रोओ मत । आप दोनों द्वारा शकुन्तला को धैर्य बंधाना चाहिये । (सभी लोग चारों ओर घुमते हैं) ।
शकुन्तला:--
हे पिता जी, कुटी के समीप विचरण करने वाली (और) गर्भ के कारण मन्द गति वाली यह हरिणी (मृगवधू) जब निर्विष्न (सकुशल) बच्चा पैदा करेगी तो (इस) प्रिय समाचार की सूचना देने वाले किसी व्यक्ति को मेरे पास भेजियेगा ।
कण्व:--
इस (बात) को नहीं भूलूंगा ।
शकुन्तला:--
(चलने में रुकावट का अभिनय कर) यह कौन मेरे वस्त्र में लिपट रहा है ? (पीछे मुडती है) ।
कण्व:--
बेटी, जिसके कुशो के अग्रभाग (नोंक) से बिंधे हुये मुख में तुम्हे द्वारा घावों को भरने वाला इङ्गुदी (हिङ्गोट) का तेल लगाया गया था, वही यह सांवा की मुठ्ठियों (ग्रासो) को खिलाकर बड़ा किया गया (पाला गया) और (तुम्हारे द्वारा) पुत्र की भाँति माना गया हरिण तुम्हारे मार्ग को नहीं छोड़ रहा है ।
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