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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 4 • श्लोक 8
प्रतिष्टस्वेदानीम्‌ । (सदृष्टिक्षेपम्‌) क्व ते शाङ्गरवमिश्राः । (प्रविश्य) शिष्यः-- भगवन्‌ , इमे स्मः । काञ्यपः- भगिन्यास्ते मार्गमादेशय । शार्ङ्धरव- इत इतो भवती । (सर्वे परिक्रामन्ति) । काश्यपः- भो भोः, सन्निहितास्तपोवनतरवः । पातुं न प्रथमं व्यवस्यति जलं युष्मास्वपीतेषु या ` नादत्ते प्रियमण्डनाऽपि भवतां स्नेहेन या पल्लवम्‌ । आद्ये वः कुसुमप्रसूतिसमये यस्या भवत्युत्सवः सेयं याति शकुन्तला पतिगृहं सर्वैरनुज्ञायताम्‌ ।।
अब प्रस्थान करो । (इधर-उधर दृष्टि डालकर) वे शार्खगरव आदि कहाँ हैं ? (प्रवेश करके) शिष्य:-- भगवन्‌ , ये हम लोग हैं । कण्व:-- अपनी बहन शकुन्तला को मार्ग दिखाओ (बताओ) । शाङ्खरव:-- आप इधर से, इधर से (आइये) । (सभी घूमते हैं) । कण्व:-- हे, हे समीपस्थ तपोवन के वृक्षों, तुम (आप) लोगों को जल पिलाये बिना जो पहले जल पीने के लिये प्रयास नहीं करती थी (अर्थात्‌ आप लोगों को बिना सिंचे जो जल नहीं पीती थी), आभूषण की प्रेमी होने पर भी जो आप लोगो के स्नेह के कारण (आप लोगों के) नये पत्तों को नहीं लेती (तोडती) थी, तुम (आप) लोगो के पहली बार पुष्प निकलने के समय जिसका उत्सव होता था (जो आनन्दित होती थी) वही यह शकुन्तला (अपने) पति के घर (ससुराल) जा रही है। (आप) सभी लोग (उसे) अनुमति (स्वीकृति) प्रदान करें ।
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