कण्व:--
शाङ्गरव, तुम मेरी ओर से शकुन्तला को आगे कर राजा से इस प्रकार कहना ।
शाङ्गरव:--
आप आज्ञा दें ।
कण्व:--
संयम रूपी धन वाले हम लोगों को, अपने ऊँचे कुल को और तुम्हरे (आपके) ऊपर इस (शकुन्तला) के, किसी भी प्रकार बन्धुओं (सम्बन्धियों) के द्वारा न कराये गये (एच्छिक प्रेम-व्यापार को भी) विचार कर तुम्हारे (आपके) द्वारा यह (शकुन्तला) (सभी) पत्नियों (रानियों) में समान गौरव (आदर) के साथ देखी जानी चाहिये । इसके आगे (अर्थात् इससे अधिक) भाग्य के अधीन है, वह वस्तुतः वधू (कन्या) के सम्बन्धियों (भाई-बन्धुओं) द्वारा नहीं कहा (मांगा) जाना चाहिये (अर्थात उसके विषय में कन्या के भाई-बन्धुओं को कुछ नहीं कहना चाहिये) ।
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