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अध्याय 24 — अध्याय 24

यजुर्वेद
40 श्लोक • केवल अनुवाद
हे मनुष्यो ! तुम जो (अश्वः) शीघ्र चलने हारा घोड़ा (तूपरः) हिंसा करनेवाला पशु (गोमृगः) और गौ के समान वर्त्तमान नीलगाय है, (ते) वे (प्राजापत्याः) प्रजापालक सूर्य देवतावाले अर्थात् सूर्यमण्डल के गुणों से युक्त (कृष्णग्रीवः) जिसकी काली गर्दन वह पशु (आग्नेयः) अग्नि देवतावाला (पुरस्तात्) प्रथम से (रराटे) ललाट के निमित्त (मेषी) मेंढ़ी (सारस्वती) सरस्वती देवतावाली (अधस्तात्) नीचे से (हन्वोः) ठोढ़ी वामदक्षिण भागों के ओर (बाह्वोः) भुजाओं के निमित्त (अधोरामौ) नीचे रमण करनेवाले (आश्विनौ) जिनका अश्विदेवता वे पशु (सौमापौष्णः) सोम और पूषा देवतावाला (श्यामः) काले रंग से युक्त पशु (नाभ्याम्) तुन्दी के निमित्त और (पार्श्वयोः) बार्इं दाहिनी ओर के निमित्त (श्वेतः) सुफेद रंग (च) और (कृष्णः) काला रंगवाला (च) और (सौर्ययामौ) सूर्य वा यमसम्बन्धी पशु वा (सक्थ्योः) पैरों की गांठियों के पास के भागों के निमित्त (लोमशसक्थौ) जिसके बहुत रोम विद्यमान ऐसे गांठियों के पास के भाग से युक्त (त्वाष्ट्रौ) त्वष्टा देवतावाले पशु वा (पुच्छे) पूँछ के निमित्त (श्वेतः) सुफेद रंगवाला (वायव्यः) वायु जिस का देवता है, वह वा (वेहत्) जो कामोद्दीपन समय के विना बैल के समीप जाने से गर्भ नष्ट करनेवाली गौ वा (वैष्णवः) विष्णु देवतावाला और (वामनः) नाटा शरीर से कुछ ढेढ़े अङ्गवाला पशु इन सबों को (स्वपस्याय) जिसके सुन्दर-सुन्दर कर्म उस (इन्द्राय) ऐश्वर्य्ययुक्त पुरुष के लिये संयुक्त करो अर्थात् उक्त प्रत्येक अङ्ग के आनन्दनिमित्तक उक्त गुणवाले पशुओं को नियत करो।
हे मनुष्यो तुम को जो (रोहितः) सामान्य लाल (धूम्ररोहितः) धुमेला लाल और (कर्कन्धुरोहितः) पके बेर के समान लाल पशु हैं, (ते) वे (सौम्याः) सोम देवता अर्थात् सोम गुणवाले, जो (बभ्रुः) न्योला के समान धुमेला (अरुणबभ्रुः) लालामी लिये हुए न्योले के समान रंगवाला और (शुकबभ्रुः) सुग्गा की समता को लिये हुए न्योले के समान रंगयुक्त पशु हैं, (ते) वे सब (वारुणाः) वरुण देवतावाले अर्थात् श्रेष्ठ जो (शितिरन्ध्रः) शितिरन्ध्र अर्थात् जिसके मर्मस्थान आदि में सुपेदी (अन्यतःशितिरन्ध्रः) जो और अङ्ग से और अङ्ग में छेद से हों, वैसी जिसके जहाँ-तहाँ सुपेदी (समन्तशितिरन्ध्रः) और जिसके सब ओर से छेदों के समान सुपेदी के चिह्न हैं, (ते) वे सब (सावित्राः) सविता देवतावाले (शितिबाहुः) जिसके अगले भुजाओं में सुपेदी के चिह्न (अन्यतःशितिबाहुः) जिसके और अङ्ग से और अङ्ग में सुपेदी के चिह्न और (समन्तशितिबाहुः) जिसके सब और से अगले गोड़ों में सुपेदी के चिह्न हैं, ऐसे जो पशु हैं, (ते) वे (बार्हस्पत्याः) बृहस्पति देवतावाले तथा जो (पृषती) सब अङ्गों से अच्छी छिटकी हुई सी (क्षुद्रपृषती) जिसके छोटे-छोटे रंग-बिरंग छींटे और (स्थूलपृषती) जिसके मोटे-मोटे छींटे (ताः) वे सब (मैत्रावरुण्यः) प्राण और उदान देवतावाले होते हैं, यह जानना चाहिये।
हे मनुष्यो ! तुमको जो (शुद्धवालः) जिसके शुद्ध बाल वा शुद्ध छोटे-छोटे अङ्ग (सर्वशुद्धवालः) जिसके समस्त शुद्ध बाल और (मणिवालः) जिसके मणि के समान चिलकते हुए बाल हैं, ऐसे जो पशु (ते) वे सब (आश्विनाः) सूर्य-चन्द्र देवतावाले अर्थात् सूर्य-चन्द्रमा के समान दिव्य गुणवाले, जो (श्येतः) सुपेद रंगयुक्त (श्येताक्षः) जिसकी सुपेद आँखें और (अरुणः) जो लाल रंगवाला है, (ते) वे (पशुपतये) पशुओं की रक्षा करने और (रुद्राय) दुष्टों को रुलानेहारे के लिये। जो ऐसे हैं कि (कर्णाः) जिनसे काम करते हैं, वे (यामाः) वायु देवतावाले (अवलिप्ताः) जिन के उन्नतियुक्त अङ्ग अर्थात् स्थूल शरीर हैं, वे (रौद्राः) प्राणवायु आदि देवतावाले तथा (नभोरूपाः) जिनका आकाश के समान नीला रूप है, ऐसे जो पशु हैं, वे सब (पार्जन्याः) मेघ देवतावाले जानने चाहियें
हे मनुष्यो जो (पृश्निः) पूछने योग्य (तिरश्चीनपृश्निः) जिसका तिरछा स्पर्श और (ऊर्ध्वपृश्निः) जिसका ऊँचा वा उत्तम स्पर्श है, (ते) वे (मारुताः) वायु देवतावाले। जो (फल्गूः) फलों को प्राप्त हों (लोहितोर्णी) जिसकी लाल ऊर्णा अर्थात् देह के बाल और (पलक्षी) जिसकी चञ्चल-चपल आँखें ऐसे पशु हैं, (ताः) वे (सारस्वत्यः) सरस्वती देवतावाले (प्लीहाकर्णः) जिसके कान में प्लीहा रोग के आकार के चिह्न हों (शुण्ठाकर्णः) जिसके सूखे कान और जिसके (अध्यालोहकर्णः) अच्छे प्रकार प्राप्त हुए सुवर्ण के समान कान ऐसे जो पशु हैं, (ते) वे सब (त्वाष्ट्राः) त्वष्टा देवतावाले, जो (कृष्णग्रीवः) काले गलेवाले (शितिकक्षः) जिसके पांजर की ओर सुपेद अङ्ग और (अञ्जिसक्थः) जिसकी प्रसिद्ध जङ्घा अर्थात् स्थूल होने से अलग विदित हों, ऐसे जो पशु हैं, (ते) वे सब (ऐन्द्राग्नाः) पवन और बिजुली देवतावाले तथा (कृष्णाञ्जिः) जिसकी करोदी हुई चाल (अल्पाञ्जिः) जिसकी थोड़ी चाल और (महाञ्जिः) जिसकी बड़ी चाल ऐसे जो पशु हैं, (ते) वे सब (उषस्याः) उषा देवतावाले होते हैं, यह जानना चाहिये।
हे मनुष्यो ! तुमको (शिल्पाः) जो सुन्दर रूपवान् और शिल्पकार्यों की सिद्धि करनेवाली (वैश्वदेव्यः) विश्वेदेव देवतावाले (वाचे) वाणी के लिये (रोहिण्यः) नीचे से ऊपर को चढ़ने योग्य (त्र्यवयः) जो तीन प्रकार की भेड़ें (अदित्यै) पृथिवी के लिये (अविज्ञाताः) विशेषकर न जानी हुई भेड़ आदि (धात्रे) धारण करने के लिये (सरूपाः) एक से रूपवाली तथा (देवानाम्) दिव्यगुणवाले विद्वानों की (पत्नीभ्यः) स्त्रियों के लिये (वत्सतर्य्यः) अतीव छोटी-छोटी थोड़ी अवस्थावाली बछिया जाननी चाहिये
हे मनुष्यो ! जो (कृष्णग्रीवाः) ऐसे हैं कि जिनकी खिंची हुई गर्दन वा खिंचा हुआ खाना निगलना वे (आग्नेयाः) अग्नि देवतावाले (शितिभ्रवः) जिनकी सुपेद भौंहें हैं, वे (वसूनाम्) पृथिवी आदि वसुओं के, जो (रोहिताः) लाल रंग के हैं, वे (रुद्राणाम्) प्राण आदि ग्यारह रुद्रों के, जो (श्वेताः) सुपेद रंग के और (अवरोकिणः) अवरोध करने अर्थात् रोकनेवाले हैं, वे (आदित्यानाम्) सूर्यसम्बन्धी महीनों के और जो (नभोरूपाः) ऐसे हैं कि जिनका जल के समान रूप है, वे जीव (पार्जन्याः) मेघदेवतावाले अर्थात् मेघ के सदृश गुणोंवाले जानने चाहियें
हे मनुष्यो ! तुम को जो (उन्नतः) ऊँचा (ऋषभः) और श्रेष्ठ (वामनः) टेढ़े अङ्गोंवाले नाटा पशु हैं, (ते) वे (ऐन्द्रावैष्णवाः) बिजुली और पवन देवतावाले, जो (उन्नतः) ऊँचा (शितिबाहुः) जिसका दूसरे पदार्थ को काटती-छाँटती हुई भुजाओं के समान बल और (शितिपृष्ठः) जिसकी सूक्ष्म की हुई पीठ ऐसे जो पशु हैं, (ते) वे (ऐन्द्राबार्हस्पत्याः) वायु और सूर्य देवतावाले (शुकरूपाः) जिनका सुग्गों के समान रूप और (वाजिनाः) वेगवाले (कल्माषाः) कबरे भी हैं, वे (आग्निमारुताः) अग्नि और पवन देवतावाले तथा जो (श्यामाः) काले रंग के हैं, वे (पौष्णाः) पुष्टिनिमित्तक मेघ देवतावाले जानने चाहियें।
हे मनुष्यो ! तुमको (एताः) ये पूर्वोक्त (द्विरूपाः) द्विरूप पशु अर्थात् जिनके दो-दो रूप हैं, वे (ऐन्द्राग्नाः) वायु और बिजुली के संगी, जो (वामनाः) टेढ़े अङ्गोंवाले व नाटे और (अनड्वाहः) बैल हैं, वे (अग्नीषोमीयाः) सोम और अग्नि देवतावाले तथा (आग्नावैष्णवाः) अग्नि और वायु देवतावाले जो (वशाः) वन्ध्या गौ हैं, वे (मैत्रावरुण्यः) प्राण और उदान देवतावाली और जो (अन्यतएन्यः) कहीं से प्राप्त हों, वे (मैत्र्यः) मित्र के प्रिय व्यवहार में जानने चाहियें।
हे मनुष्यो ! तुमको जो (कृष्णग्रीवाः) काले गले के हैं, वे (आग्नेयाः) अग्निदेवतावाले, जो (बभ्रवः) न्योले के रंगवाले हैं, वे (सौम्याः) सोम देवतावाले जो (श्वेताः) सुपेद हैं, वे (वायव्याः) वायु देवतावाले, जो (अविज्ञाताः) विशेष चिह्न से कुछ न जाने गये, वे (अदित्यै) जो कभी नाश नहीं होती उस उत्पत्तिरूप क्रिया के लिये, जो (सरूपाः) ऐसे हैं कि जिनका एकसा रूप है, वे (धात्रे) धारण करने हारे पवन के लिये। और जो (वत्सतर्यः) छोटी-छोटी बछियाँ हैं, वे (देवानाम्) सूर्य आदि लोकों की (पत्नीभ्यः) पालना करनेवाली क्रियाओं के लिये जानने चाहियें
हे मनुष्यो ! तुम को जो (कृष्णाः) काले रंग के वा खेत आदि के जुताईवाले हैं, वे (भौमाः) भूमि देवतावाले (धूम्राः) धुमेले हैं, वे (आन्तरिक्षाः) अन्तरिक्ष देवतावाले, जो (दिव्याः) दिव्य गुण कर्म स्वभावयुक्त (बृहन्तः) बढ़ते हुए और (शबलाः) थोड़े सुपेद हैं, वे (वैद्युताः) बिजुली देवतावाले और जो (सिध्माः) मङ्गल कराने हारे हैं, वे (तारकाः) दुःख के पार उतारनेवाले जानने चाहियें
जो मनुष्य (वसन्ताय) वसन्त ऋतु में सुख के लिये (धूम्रान्) धुमेले पदार्थों के (ग्रीष्माय) ग्रीष्म ऋतु में आनन्द के लिये (श्वेतान्) सुपेद रंग के (वर्षाभ्यः) वर्षा ऋतु में कार्यसिद्धि के लिये (कृष्णान्) काले रंग के वा खेती की सिद्धि करानेवाले (शरदे) शरद् ऋतु में सुख के लिये (अरुणान्) लाल रंग के (हेमन्ताय) हेमन्त ऋतु में कार्य साधने के लिये (पृषतः) मोटे और (शिशिराय) शिशिर ऋतुसम्बन्धी व्यवहार साधने के लिये (पिशङ्गान्) लालामी लिये हुए पीले पदार्थों को (आ, लभते) अच्छे प्रकार प्राप्त होता है, वह निरन्तर सुखी होता है।
जो (त्र्यवयः) ऐसे हैं कि जिन की तीन भेड़ें वे (गायत्र्यै) गाते हुओं की रक्षा करनेवाली के लिये (पञ्चावयः) जिन के पाँच भेड़ें हैं, वे (त्रिष्टुभे) तीन अर्थात् शरीर, वाणी और मन सम्बन्धी सुखों के स्थिर करने के लिये। जो (दित्यवाहः) विनाश में न प्रसिद्ध हों, उन की प्राप्ति करानेवाले (जगत्यै) संसार की रक्षा करने की जो क्रिया उस के लिये (त्रिवत्साः) जिन के तीन स्थानों में निवास वे (अनुष्टुभे) पीछे से रोकने की क्रिया के लिये और (तुर्यवाहः) जो अपने पशुओं में चौथे को प्राप्त करानेवाले हैं, वे (उष्णिहे) जिस क्रिया से उत्तमता के साथ प्रसन्न हों, उस क्रिया के लिये अच्छा यत्न करें, वे सुखी हों।
जिन मनुष्यों ने (विराजे) विराट् छन्द के लिये (पष्ठवाहः) जो पीठ से पदार्थों को पहुँचाते (बृहत्यै) बृहती छन्द के अर्थ को (उक्षाणः) वीर्य सींचने में समर्थ (ककुभे) ककुप् उष्णिक्छन्द के अर्थ को (ऋषभाः) अतिबलवान् प्राणी (पङ्क्त्यै) पङ्क्ति छन्द के अर्थ को (अनड्वाहः) लढ़ा पहुँचाने में समर्थ बैलों को (अतिछन्दसे) अतिजगती आदि छन्द के अर्थ को (धेनवः) दूध देनेवाली गौएँ स्वीकार कीं, वे अतीव सुख पाते हैं
हे मनुष्यो ! तुम को जो (कृष्णग्रीवाः) काले गलेवाले हैं, वे (आग्नेयाः) अग्नि देवतावाले। जो (बभ्रवः) सब का धारण पोषण करनेवाले हैं, वे (सौम्याः) सोम देवतावाले। जो (उपध्वस्ताः) नीचे के समीप गिरे हुए हैं, वे (सावित्राः) सविता देवतावाले। जो (वत्सतर्य्यः) छोटी-छोटी बछिया हैं, वे (सारस्वत्यः) वाणी देवतावाली। जो (श्यामाः) काले वर्ण के हैं, वे (पौष्णाः) पुष्टि करने हारे मेघ देवतावाले। जो (पृश्नयः) पूछने योग्य हैं, वे (मारुताः) मनुष्य देवतावाले। जो (बहुरूपाः) बहुरूपी अर्थात् जिन के अनेक रूप हैं, वे (वैश्वदेवाः) समस्त विद्वान् देवतावाले और जो (वशाः) निरन्तर चिलकते हुए हैं, वे (द्यावापृथिवीयाः) आकाश-पृथिवी देवतावाले जानने चाहियें
हे मनुष्यो ! तुम को (एताः) ये (उक्ताः) कहे हुए (सञ्चराः) जो अच्छे प्रकार चलने हारे पशु आदि हैं, वे (ऐन्द्राग्नाः) इन्द्र और अग्नि देवतावाले। जो (कृष्णाः) खींचने वा जोतने हारे हैं, वे (वारुणाः) वरुण देवतावाले और जो (पृश्नयः) चित्र-विचित्र चिह्न युक्त (मारुताः) मनुष्य के से स्वभाववाले (तूपराः) हिंसक हैं, वे (कायाः) प्रजापति देवतावाले हैं, यह जानना चाहिये।
हे मनुष्यो ! जैसे विद्वान् जन (अनीकवते) प्रशंसित सेना रखनेवाले (अग्नये) अग्नि के समान वर्त्तमान तेजस्वी सेनाधीश के लिये (प्रथमजान्) विस्तारयुक्त कारण से उत्पन्न हुए (सान्तपनेभ्यः) जिनका अच्छे प्रकार ब्रह्मचर्य्य आदि आचरण है, उन (मरुद्भ्यः) प्राण के समान प्रीति उत्पन्न करनेवाले मनुष्यों के लिये (सवात्यान्) एक से पवन में हुए पदार्थों (गृहमेधिभ्यः) घर में जिन की धीर बुद्धि है, उन (मरुद्भ्यः) मनुष्यों के लिये (बष्किहान्) बहुत काल के उत्पन्न हुओं (क्रीडिभ्यः) प्रशंसायुक्त विहार आनन्द करनेवाले (मरुद्भ्यः) मनष्यों के लिये (संसृष्टान्) अच्छे प्रकार गुणयुक्त और (स्वतवद्भ्यः) जिनका आप से आप निवास है, उन (मरुद्भ्यः) स्वतन्त्र मनुष्यों के लिये (अनुसृष्टान्) मिलनेवालों को (आ, लभते) प्राप्त होता है, तुम लोग इन को प्राप्त होओ।
हे मनुष्यो ! तुम को जो (एताः) ये (ऐन्द्राग्नाः) वायु और बिजुली देवतावाले (प्राशृङ्गाः) जिन के उत्तम सींग हैं, वे (माहेन्द्राः) महेन्द्र देवतावाले वा (बहुरूपाः) बहुत रंगयुक्त (वैश्वकर्मणाः) विश्वकर्मा देवतावाले (सञ्चराः) जिनमें अच्छे प्रकार आते-जाते हैं, वे मार्ग (उक्ताः) निरूपण किये, उनमें जाना-आना चाहिये ।
हे मनुष्यो ! तुम को (सोमवताम्) सोम शान्ति आदि गुणयुक्त उत्पन्न करनेवाले (पितॄणाम्) माता- पिताओं के (बभ्रुनीकाशाः) न्योले के समान (धूम्राः) धुमेले रंगवाले (बर्हिषदाम्) जो सभा के बीच बैठते हैं, उन (पितॄणाम्) पालना करने हारे विद्वानों के (कृष्णाः) काले रंगवाले (धूम्रनीकाशाः) धुआँ के समान अर्थात् धुमेले और (बभ्रवः) पुष्टि करनेवाले तथा (अग्निष्वात्तानाम्) जिन्होंने अग्निविद्या ग्रहण की है, उन (पितॄणाम्) पालना करने हारे विद्वानों के (बभ्रुनीकाशाः) पालने हारे के समान (कृष्णाः) काले रंगवाले (पृषन्तः) मोटे अङ्गों से युक्त (त्रैयम्बकाः) जिनका तीन अधिकारों में चिह्न है, वे प्राणी वा पदार्थ हैं, यह जानना चाहिये।
हे मनुष्यो ! तुम जो (एताः) ये (शुनासीरीयाः) शुनासीर देवतावाले अर्थात् खेती की सिद्धि करनेवाले (सञ्चराः) आने-जाने हारे (वायव्याः) पवन के समान दिव्यगुणयुक्त (श्वेताः) सुपेद रङ्गवाले वा (सौर्याः) सूर्य के समान प्रकाशमान (श्वेताः) सुपेद रङ्ग के पशु (उक्ताः) कहे हैं, उनको अपने कार्यों में अच्छे प्रकार निरन्तर नियुक्त करो
हे मनुष्यो ! पक्षियों को जाननेवाला जन (वसन्ताय) वसन्त ऋतु के लिये (कपिञ्जलान्) जिन कपिञ्जल नाम के विशेष पक्षियों (ग्रीष्माय) ग्रीष्म ऋतु के लिये (कलविङ्कान्) चिरौटा नाम के पक्षियों (वर्षाभ्यः) वर्षा ऋतु के लिये (तित्तिरीन्) तीतरों (शरदे) शरद् ऋतु के लिये (वर्त्तिकाः) बतकों (हेमन्ताय) हेमन्त ऋतु के लिये (ककरान्) ककर नाम के पक्षियों और (शिशिराय) शिशिर ऋतु के अर्थ (विककरान्) विककर नाम के पक्षियों को (आ, लभते) अच्छे प्रकार प्राप्त होता है, उन को तुम जानो
हे मनुष्यो ! जैसे जल के जीवों की पालना करने को जाननेवाला जन (समुद्राय) महाजलाशय समुद्र के किये (शिशुमारान्) जो अपने बालकों को मार डालते हैं, उन शिशुमारों (पर्जन्याय) मेघ के लिये (मण्डूकान्) मेंडकों (अद्भ्यः) जलों के लिये (मत्स्यान्) मछलियों (मित्राय) मित्र के समान सुख देते हुए सूर्य्य के लिये (कुलीपयान्) कुलीपय नाम के जंगली पशुओं और (वरुणाय) वरुण के लिये (नाक्रान्) नाके मगर जलजन्तुओं को (आ, लभते) अच्छे प्रकार प्राप्त होता है, वैसे तुम भी प्राप्त होओ
हे मनुष्यो ! जैसे पक्षियों के गुण का विशेष ज्ञान रखनेवाला पुरुष (सोमाय) चन्द्रमा वा औषधियों में उत्तम सोम के लिये (हंसान्) हंसों (वायवे) पवन के लिये (बलाकाः) बगुलियों (इन्द्राग्निभ्याम्) इन्द्र और अग्नि के लिये (क्रुञ्चान्) सारसों (मित्राय) मित्र के लिये (मद्गून्) जल के कौओं वा सुतरमुर्गों और (वरुणाय) वरुण के लिये (चक्रवाकान्) चकई-चकवों को (आ, लभते) अच्छे प्रकार प्राप्त होता है, वैसे तुम भी प्राप्त होओ।
हे मनुष्यो ! जैसे पक्षियों के गुण जाननेवाला जन (अग्नये) अग्नि के लिये (कुटरून्) मुर्गों (वनस्पतिभ्यः) वनस्पति अर्थात् विना पुष्प-फल देनेवाले वृक्षों के लिये (उलूकान्) उल्लू पक्षियों (अग्नीषोमाभ्याम्) अग्नि और सोम के लिये (चाषान्) नीलकण्ठ पक्षियों (अश्विभ्याम्) सूर्य-चन्द्रमा के लिये (मयूरान्) मयूरों तथा (मित्रावरुणाभ्याम्) मित्र और वरुण के लिये (कपोतान्) कबूतरों को (आ, लभते) अच्छे प्रकार प्राप्त होता है, वैसे इनको तुम भी प्राप्त होओ।
हे मनुष्यो ! जैसे पक्षियों का काम जाननेवाला जन (सोमाय) ऐश्वर्य के लिये (लबान्) बटेरों (त्वष्ट्रे) प्रकाश के लिये (कौलीकान्) कौलीक नाम के पक्षियों (देवानाम्) विद्वानों की (पत्नीभ्यः) स्त्रियों के लिये (गोसादीः) जो गौओं को मारती हैं, उन पखेरियों (देवजामिभ्यः) विद्वानों की बहिनियों के लिये (कुलीकाः) कुलीक नामक पखेरियों और (अग्नये) जो अग्नि के समान वर्त्तमान (गृहपतये) गृहपालन करनेवाला उस के लिये (पारुष्णान्) पारुष्ण पक्षियों को (आ, लभते) प्राप्त होता है, वैसे तुम भी प्राप्त होओ
हे मनुष्यो ! जैसे काल का जाननेवाला (अह्ने) दिवस के लिये (पारावतान्) कोमल शब्द करनेवाले कबूतरों (रात्र्यै) रात्रि के लिये (सीचापूः) सीचापू नामक पक्षियों (अहोरात्रयोः) दिन-रात्रि के (सन्धिभ्यः) सन्धियों अर्थात् प्रातः सायंकाल के लिये (जतूः) जतूनामक पक्षियों (मासेभ्यः) महीनों के लिये (दात्यौहान्) काले कौओं और (संवत्सराय) वर्ष के लिये (महतः) बड़े-बड़े (सुपर्णान्) सुन्दर-सुन्दर पंखोंवाले पक्षियों को (आ, लभते) अच्छे प्रकार प्राप्त होता है, वैसे तुम भी इन को प्राप्त होओ।
हे मनुष्यो ! जैसे भूमि के जन्तुओं के गुण जाननेवाला पुरुष (भूम्यै) भूमि के लिये (आखून्) मूषों (अन्तरिक्षाय) अन्तरिक्ष के लिये (पाङ्क्तान्) पङ्क्तिरूप से चलनेवाले विशेष पक्षियों (दिवे) प्रकाश के लिये (कशान्) कश नाम के पक्षियों (दिग्भ्यः) पूर्व आदि दिशाओं के लिये (नकुलान्) नेउलों और (अवान्तरदिशाभ्यः) अवान्तर अर्थात् कोण दिशाओं के लिए (बभ्रुकान्) भूरे-भूरे विशेष नेउलों को (आ, लभते) अच्छे प्रकार प्राप्त होता है, वैसे तुम भी प्राप्त होओ।
हे मनुष्यो ! जैसे पशुओं के गुणों का जाननेवाला जन (वसुभ्यः) अग्नि आदि वसुओं के लिये (ऋश्यान्) ऋश्य जाति के हरिणों (रुद्रेभ्यः) प्राण आदि रुद्रों के लिए (रुरून्) रोजनामी जन्तुओं (आदित्येभ्यः) बारह महीनों के लिये (न्यङ्कून्) न्यङ्कु नामक पशुओं (विश्वेभ्यः) समस्त (देवेभ्यः) दिव्य पदार्थों वा विद्वानों के लिये (पृषतान्) पृषत् जाति के मृगविशेषों और (साध्येभ्यः) सिद्ध करने के जो योग्य हैं, उनके लिये (कुलुङ्गान्) कुलुङ्ग नाम के पशुविशेषों को (आ, लभते) अच्छे प्रकार प्राप्त होता है, वैसे इनको तुम भी प्राप्त होओ
हे राजा जो मनुष्य (ईशानाय) समर्थ जन के लिये (त्वा) आप और (परस्वतः) परस्वत् नामी मृगविशेषों को (मित्राय) मित्र के लिये (गौरान्) गोरे मृगों को (वरुणाय) अति श्रेष्ठ के लिये (महिषान्) भैसों को (बृहस्पतये) बृहस्पति अर्थात् महात्माओं के रक्षक के लिये (गवयान्) नीलगायों को और (त्वष्ट्रे) त्वष्टा अर्थात् पदार्थविद्या से पदार्थों को सूक्ष्म करनेवाले के लिये (उष्ट्रान्) ऊँटों को (आ, लभते) अच्छे प्रकार प्राप्त होता है, वह धनधान्य युक्त होता है।
जो मनुष्य (प्रजापतये) प्रजा पालने हारे राजा के लिये (पुरुषान्) पुरुषों (हस्तिनः) और हाथियों (वाचे) वाणी के लिये (प्लुषीन्) प्लुषि नाम के जीवों (चक्षुषे) नेत्र के लिये (मशकान्) मशाओं और (श्रोत्राय) कान के लिये (भृङ्गाः) भौंरों को (आ, लभते) प्राप्त होता है, वह बली और पुष्ट इन्द्रियोंवाला होता है
हे मनुष्यो ! तुमको (प्रजापतये) प्रजा पालनेवाले (च) और उस के सम्बन्धियों तथा (वायवे) वायु (च) और वायु के सम्बन्धी पदार्थों के लिये (गोमृगः) जो पृथिवी को शुद्ध करता वह (वरुणाय) अति उत्तम के लिये (आरण्यः) वन का (मेषः) मेंढा (यमाय) न्यायाधीश के लिये (कृष्णः) काला हरिण (मनुष्यराजाय) मनुष्यों के राजा के लिये (मर्कटः) वानर (शार्दूलाय) बड़े सिंह अर्थात् केशरी के लिये (रोहित्) लाल मृग (ऋषभाय) श्रेष्ठ सभ्य पुरुष के लिये (गवयी) नीलगाहिनी (क्षिप्रश्येनाय) शीघ्र चलने हारे बाज पखेरू के समान जो वर्त्तमान उस के लिये (वर्त्तिका) वतक (नीलङ्गोः) जो नील को प्राप्त होता उस छोटे कीड़े के हेतु (कृमिः) छोटा कीड़ा (समुद्राय) समुद्र के लिये (शिशुमारः) बालकों को मारनेवाला शिशुमार और (हिमवते) जिसके अनेकों हिमखण्ड विद्यमान हैं, उस पर्वत के लिये (हस्ती) हाथी अच्छे प्रकार युक्त करना चाहिये।
हे मनुष्यो ! तुमको (प्राजापत्यः) प्रजापति देवतावाला (मयुः) किंनर निन्दित मनुष्य और जो (उलः) छोटा कीड़ा (हलिक्ष्णः) विशेष सिंह और (वृषदंशः) विलार हैं (ते) वे (धात्रे) धारण करनेवाले के लिये (कङ्कः) उजली चील्ह (दिशाम्) दिशाओं के हेतु (धुङ्क्षा) धुङ्क्षा नाम की पक्षिणी (आग्नेयी) अग्नि देवतावाली जो (कलविङ्कः) चिरौटा (लोहिताहिः) लाल साँप और (पुष्करसादः) तालाब में रहनेवाला है, (ते) वे सब (त्वाष्ट्राः) त्वष्टा देवतावाले तथा (वाचे) वाणी के लिये (क्रुञ्चः) सारस जानना चाहिये।
हे मनुष्यो ! यदि तुमने (सोमाय) सोम के लिये जो (कुलुङ्गः) कुलुङ्ग नामक पशु वा (आरण्यः) वनेला (अजः) बकरा (नकुलः) न्योला और (शका) सामर्थ्यवाला विशेषु पशु है, (ते) वे (पौष्णाः) पुष्टि करनेवाले के सम्बन्धी वा (मायोः) विशेष सियार के हेतु (क्रोष्टा) सामान्य सियार वा (इन्द्रस्य) ऐश्वर्य्ययुक्त पुरुष के अर्थ (गौरमृगः) गोरा हरिण वा जो (पिद्वः) विशेष मृग (न्यङ्कुः) किसी और जाति का हरिण और (कक्कटः) कक्कट नाम का मृग है, (ते) वे (अनुमत्यै) अनुमति के लिये तथा (प्रतिश्रुत्कायै) सुने पीछे सुनानेवाली के लिये (चक्रवाकः) चकई-चकवा पक्षी अच्छे प्रकार युक्त किये जावें तो बहुत काम करने को समर्थ हो सकें
हे मनुष्यो ! तुमको (सौरी) जिसका सूर्य देवता है, वह (बलाका) बगुलिया तथा जो (शार्गः) पपीहा पक्षी (सृजयः) सृजय नामवाला और (शयाण्डकः) शयाण्डक पक्षी हैं, (ते) वे (मैत्राः) प्राण देवतावाले (शारिः) शुग्गी (पुरुषवाक्) पुरुष के समान बोलने हारा शुग्गा (सरस्वत्यै) नदी के लिये (श्वावित्) सेही (भौमी) भूमि देवतावाली जो (शार्दूलः) केशरी सिंह (वृकः) भेड़िया और (पृदाकुः) साँप हैं, (ते) वे (मन्यवे) क्रोध के लिये तथा (शुकः) शुद्धि करने हारा सुवा पक्षी और (पुरुषवाक्) जिसकी मनुष्य की बोली के समान बोली है, वह पक्षी (सरस्वते) समुद्र के लिये जानना चाहिये
हे मनुष्यो ! तुम को जो (सुपर्णः) सुन्दर गिरने वा जानेवाला पक्षी वह (पार्जन्यः) मेघ के समान गुणवाला जो (आतिः) आति नामवाला पक्षी (वाहसः) अजगर साँप (दर्विदा) और काठ को छिन्न-भिन्न करनेवाला पक्षी है, (ते) वे सब (वायवे) पवन के लिये (पैङ्गराजः) पैङ्गराज नाम का पक्षी (बृहस्पतये) बड़े-बड़े पदार्थों और (वाचः, पतये) वाणी की पालना करने हारे के लिये (अलजः) अलज पक्षी (आन्तरिक्षः) अन्तरिक्ष देवतावाला जो (प्लवः) जल में तरनेवाला बतक पक्षी (मद्गुः) जल का कौआ और (मत्स्यः) मछली हैं, (ते) वे सब (नदीपतये) समुद्र के लिये और जो (कूर्मः) कछुआ है, वह (द्यावापृथिवीयः) प्रकाश भूमि देवतावाला जानना चाहिये।
हे मनुष्यो ! तुम को जो (पुरुषमृगः) पुरुषों को शुद्ध करने हारा विशेष पशु वह (चन्द्रमसः) चन्द्रमा के अर्थ जो (गोधा) गोह (कालका) कालका पक्षी और (दार्वाघाटः) कठफोरवा हैं, (ते) वे (वनस्पतीनाम्) वनस्पतियों के सम्बन्धी जो (कृकवाकुः) मुर्गा वह (सावित्रः) सविता देवतावाला जो (हंसः) हंस है, वह (वातस्य) पवन के अर्थ जो (नाक्रः) नाके का बच्चा (मकरः) मगरमच्छ (कुलीपयः) और विशेष जलजन्तु हैं, (ते) वे (अकूपारस्य) समुद्र के अर्थ और जो (शल्यकः) सेही है, वह (ह्रियै) लज्जा के लिये जानना चाहिये।
हे मनुष्यो ! तुम को जो (ऐणी) हरिणी है, वह (अह्नः) दिन के अर्थ जो (मण्डूकः) मेंडुका (मूषिका) मूषटी और (तित्तिरिः) तीतरि पक्षिणी हैं, (ते) वे (सर्पाणाम्) सर्पों के अर्थ जो (लोपाशः) कोई वनचर विशेष पशु वह (आश्विनः) अश्वि देवतावाला, जो (कृष्णः) काले रंग का हरिण आदि है, वह (रात्र्यै) रात्रि के लिये जो (ऋक्षः) रीछ (जतूः) जतू नामवाला और (सुषिलीका) सुषिलीका पक्षी है, (ते) वे (इतरजनानाम्) और मनुष्यों के अर्थ और (जहका) अङ्गों का संकोच करनेहारी पक्षिणी (वैष्णवी) विष्णु देवतावाली जानना चाहिये
हे मनुष्यो ! तुम को जो (अन्यवापः) कोकिला पक्षी है, वह (अर्द्धमासानाम्) पखवाड़ों के अर्थ जो (ऋश्यः) ऋश्य जाति का मृग (मयूरः) मयूर और (सुपर्णः) अच्छे पंखोंवाला विशेष पक्षी है, (ते) वे (गन्धर्वाणाम्) गानेवालों के और (अपाम्) जलों के अर्थ जो (उद्रः) जलचर गिंगचा है, वह (मासान्) महीनों के अर्थ जो (कश्यपः) कछुआ (रोहित्) विशेष मृग (कुण्डृणाची) कुण्डृणाची नाम की वन में रहनेवाली और (गोलत्तिका) गोलत्तिका नामवाली विशेष पशुजाति है, (ते) वे (अप्सरसाम्) किरण आदि पदार्थों के अर्थ और जो (असितः) काले गुणवाला विशेष पशु है, वह (मृत्यवे) मृत्यु के लिये जानना चाहिये
हे मनुष्यो ! तुम को जो (वर्षाहूः) वर्षा को बुलाती है, वह मेंडुकी (ऋतूनाम्) वसन्त आदि ऋतुओं के अर्थ (आखुः) मूषा (कशः) सिखाने योग्य कश नामवाला पशु और (मान्थालः) मान्थाल नामी विशेष जन्तु हैं, (ते) वे (पितॄणाम्) पालना करनेवालों के अर्थ (बलाय) बल के लिये (अजगरः) बड़ा साँप (वसूनाम्) अग्नि आदि वस्तुओं के अर्थ (कपिञ्जलः) कपिञ्जल नामक (कपोतः) जो कबूतर (उलूकः) उल्लू और (शशः) खरहा हैं, (ते) वे (निर्ऋत्यै) निर्ऋति के लिए (वरुणाय) और वरुण के लिये (आरण्यः) बनेला (मेषः) मेढ़ा जानना चाहिये।
हे मनुष्यो ! तुम को जो (श्वित्रः) चित्र-विचित्र रंगवाला पशु-विशेष वह (आदित्यानाम्) समय के अवयवों के अर्थ, जो (उष्ट्रः) ऊँट (घृणीवान्) तेजस्वि विशेष पशु और (वार्ध्रीनसः) कण्ठ में जिस के थन ऐसा बड़ा बकरा है, (ते) वे सब (मत्यै) बुद्धि के लिये, जो (सृमरः) नीलगाय वह (अरण्याय) वन के लिये, जो (रुरुः) मृगविशेष है, वह (रौद्रः) रुद्र देवतावाला, जो (क्वयिः) क्वयिनाम का पक्षी (कुटरुः) मुर्गा और (दात्यौहः) कौआ हैं, (ते) वे (वाजिनाम्) घोड़ों के अर्थ और जो (पिकः) कोकिला है, वह (कामाय) काम के लिये अच्छे प्रकार जानने चाहिये
हे मनुष्यो ! तुम को जो (खड्गः) ऊँचे और पैने सींगोंवाला गैंडा है, वह (वैश्वदेवः) सब विद्वानों का, जो (कृष्णः) काले रंगवाला (श्वा) कुत्ता (कर्णः) बड़े कानोंवाला (गर्दभः) गदहा और (तरक्षुः) व्याघ्र हैं, (ते) वे सब (रक्षसाम्) राक्षस दुष्टहिंसक हवषियों के अर्थ, जो (सूकरः) सुअर है, वह (इन्द्राय) शत्रुओं को विदारनेवाले राजा के लिये, जो (सिंहः) सिंह है, वह (मारुतः) मरुत् देवतावाला, जो (कृकलासः) गिरगिटान (पिप्पका) पिप्पका नाम की पक्षिणी और (शकुनिः) पक्षिमात्र हैं, (ते) वे सब (शरव्यायै) जो शरवियों में कुशल उत्तम है, उस के लिये और जो (पृषतः) पृषज्जाति के हरिण हैं, वे (विश्वेषाम्) सब (देवानाम्) विद्वानों के अर्थ जानना चाहिये।
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