हे मनुष्यो ! जैसे विद्वान् जन (अनीकवते) प्रशंसित सेना रखनेवाले (अग्नये) अग्नि के समान वर्त्तमान तेजस्वी सेनाधीश के लिये (प्रथमजान्) विस्तारयुक्त कारण से उत्पन्न हुए (सान्तपनेभ्यः) जिनका अच्छे प्रकार ब्रह्मचर्य्य आदि आचरण है, उन (मरुद्भ्यः) प्राण के समान प्रीति उत्पन्न करनेवाले मनुष्यों के लिये (सवात्यान्) एक से पवन में हुए पदार्थों (गृहमेधिभ्यः) घर में जिन की धीर बुद्धि है, उन (मरुद्भ्यः) मनुष्यों के लिये (बष्किहान्) बहुत काल के उत्पन्न हुओं (क्रीडिभ्यः) प्रशंसायुक्त विहार आनन्द करनेवाले (मरुद्भ्यः) मनष्यों के लिये (संसृष्टान्) अच्छे प्रकार गुणयुक्त और (स्वतवद्भ्यः) जिनका आप से आप निवास है, उन (मरुद्भ्यः) स्वतन्त्र मनुष्यों के लिये (अनुसृष्टान्) मिलनेवालों को (आ, लभते) प्राप्त होता है, तुम लोग इन को प्राप्त होओ।
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