Krishjan
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अध्याय 19 — नवदश अध्याय
शिवभारतम्
36 श्लोक • केवल अनुवाद
गुप्तचर रूपी अपनी दृष्टि को सर्वत्र युक्त करके वह शिवाजी अपने राज्य के एवं पर राज्य के सभी समाचारों को दक्षता के साथ देखता था। तत्पश्चात अपने कार्य में निपुण दूत को बुलाकर उसने शत्रु को यह उत्तर भेजा।
शिवाजी बोला - जिसने कर्नाटक के सभी राजा युद्ध में पराभूत कर दिए थे ऐसे आपने आज मेरे पर इतनी दया दिखाई वह बहुत अच्छा किया।
आप में बाहुबल अतुलनीय है आपका पराक्रम अग्नि के समान है आपने पृथ्वी को अलंकृत किया है और आप में मूलतः ही कपट नहीं है।
यदि यह वन वैभव देखने की इच्छा आपको है तो आप जयवल्ली आकर देख लीजिए।
आपका यहां आना ही संप्रति योग्य है ऐसा मुझे लगता है और उसके कारण से ही मुझे निर्भयता प्राप्त होकर मेरा वैभव भी वृद्धि को प्राप्त होगा।
भयंकर पराक्रम से युक्त आपके बिना उन्मत्त मुगलों की सेना को एवं आदिलशाह की सेना को मैं तिनके के समान मानता हूं।
आप सावधानीपूर्वक रास्ते से आइए आप जो मांग कर रहे हैं उन किलों को एवं जयवल्ली को भी मैं देता हूं।
जिनको देखना भी कठिन होता है ऐसे आपको यहां संदेह रहित मन से देखकर मैं अपने कटार को आपके सामने रख दूंगाI
इस प्राचीन एवं विशाल और अन्य को देखकर आपकी सेना पाताल की छाया के सुख का अनुभव करेगी।
इस प्रकार सूत्र के समान अत्यंत संक्षिप्त किंतु सारगर्भित संदेश बताकर अपने दूत को शिवाजी ने प्रेषित किया।
शिवाजी के दूत द्वारा बताए गए संदेश को सुनकर 'आपने स्वामिकार्य कर लिया है' ऐसा उस दुर्बुद्धि अफजल खान को प्रतीत हुआ।
उस यवन को विराट (वाई) में स्थित होकर तीन योजन अंतर पर स्थित जयवल्ली हाथ में आ गई ऐसा प्रतीत होने लगा।
तत्पश्चात दरबार में बैठकर तथा अपने सैनिकों को बुलाकर उस महत्वाकांक्षी अफजल खान ने इस प्रकार राजनीति युक्त भाषण किया।
अफजल खान बोला - वह शिवाजी संधि करने की इच्छा से मुझे वहां बुला रहा है तब स्वामिकार्य सिद्ध करने की इच्छा से मुझे वहां जाना चाहिए।
शस्त्र उठाए हुए एवं उत्तम प्रकार से सुसज्जित अपने सैनिकों के साथ सदा जागरूक रहने वाले हम लोगों को वहां जाने में भय नहीं है।
उस स्थान पर कोई गुप्त स्थान तो होगा ही ऐसे उस सघन अरण्य में सेना ले जाकर एवं व्यूह रचना करेंगे और कुछ हो गया तो जाएंगे।
सिंह एवं हाथियों के आश्रय स्थान वाले उस अरण्य में आराम करते समय तुमको प्रतिक्षण निगरानी करनी चाहिए।
वहां पर्वतों के तट पर विशाल जलाशय को देखकर मेरे हाथी वन्यू हाथी के समान स्वतंत्रता से विहार करते हैं तो करने दो।
यदि आकाश गिर जाए या फिर आकाशीय विद्युत गरजना करके गिर जाएं फिर भी अफजल खान की बुद्धि में कोई परिवर्तन नहीं होगा।
मेरी क्रोधाग्नि से मैं तत्काल वन को जला दूंगा भूमि को खोद दूंगा एवं पर्वतों को समतल कर दूंगा।
यदि वह जनता के कारण से मेरी कथित बातों को स्वीकार नहीं करेगा तो मैं देवता नष्ट कर दूंगा और अपनी प्रतिज्ञा को पूर्ण करूंगा।
दरबार में शोभायमान आसन पर बैठकर इस प्रकार बोलने वाले अफजल खान का निषेध दुर्देव से विनष्ट बुद्धि बाले उन सैनिकों ने नहीं किया।
फिर आगे प्रस्थान के लिए उद्यत उस अफजलखान को सभी मंत्रियों ने राजनीति का अनुसरण करके विनम्रता से निवेदन किया।
मंत्री बोले - हे स्वामी आप जो करना चाहते हैं, वह आप अवश्य कीजिए जहां पर स्वयं देवता अधिष्ठित है, वहां निषेध कौन कर सकता है।
उसने यदि तुम पर शुद्ध अंतःकरण से विश्वास किया है तो उसको जयवल्ली के वन से बाहर तत्काल आना चाहिए।
उसको आप को संतुष्ट करने के लिए अपना सर्वस्व अर्पण करना चाहिए और आपको पग पग पर मुजरा देते हुए अपनी गर्दन को आपके सामने झुकाना चाहिए।
जिस धनुर्धारी ने बचपन से ही शंकर के अतिरिक्त अन्य किसी भी स्वामी के सामने अपना सिर सपने में अभी तक नहीं झुकाया है, जिस महाबलशाली पुरुष के अमानवीय कृत्यों को बचपन से ही हम प्रायः सुनते आए हैं, जो यवनों के मुख्य दर्शन को भी अत्यधिक निंदनीय समझता है और जो स्वधर्म में धुरंधर है ऐसा वह यवनों की बातों को बोलता ही नहीं सुनता है तो यदि वह निर्भयता से हमको वहीं पर बुला रहा है तो उसके हृदय में किसी प्रकार का साहस है ऐसा मुझे लगता है।
जो पग पग पर बांस के सघन वृक्षों से व्याप्त है, ऐसी वह दुर्गम पर्वत भूमि घोड़ों के जाने के लिए हितकर नहीं है।
जिसका मुंह सैकड़ों वृक्षों से व्याप्त है एवं जो आरोहण अवरोहण के लिए अत्यधिक संकुचित है ऐसे पर्वत मार्ग से हाथी किस प्रकार जा सकते हैं।
तू अल्लीशाह का प्राण है एवं दिल्ली के बादशाह के हृदय का शूल है और उत्तम सेना का स्वामी है अतः तू इस भयंकर रास्ते पर या खड्डे में प्रवेश मत करना।
जिसने योगी के समान अपने आहार-विहार को एवं अपने आसन को जीता है एवं जो संपूर्ण संसार के गुप्त अभिप्राय को जानता है। जिस प्रकार गरुड़ सांप के फणों को काटता है उसी प्रकार जो किले के मस्तक पर छलांग मारकर प्रकार में स्थित शत्रु का विनाश करता है। जो मित्र कौन है एवं शत्रु कौन है? यह मन से ही जानता है, लोगों को प्रेरित करने वाले हमारे द्वारा अपमान की गई तुलजा देवी जिसको सदा सहयोग करती है एवं जो अनेक सैन्यों से युक्त है ऐसे शत्रु के द्वारा रक्षित विशाल अरण्य में अभिमानी हम किस प्रकार प्रवेश कर सकते हैं।
इस प्रकार उसके वचनों को सुनकर देश भाव से अंधत्व को प्राप्त हुआ एवं क्रोध की लालिमा से युक्त आखों वाला वह उन्मतता से युक्त उसका धिक्कार करके बोला।
अफजल खान बोला - स्वभाव से स्वाभिमानी वह शत्रु अब तक अपराध करते आया है। वह स्वयं हमारे पास में कैसे आ सकता है?
अमानवीय कृत्यों को करने वाले ऐसे जिस मनुष्य की प्रशंसा कर रहे हो तो आप मेरे पराक्रम को ना पहचानने के कारण कर रहे हो ऐसा मुझे लगता है।
जिसने दौड़ने वाले घोड़ों के खुरो से कर्नाटक के राजाओं की सेनाओं को विनष्ट किया जिसने सभी स्थानों को फोड़कर संप्रति सभी स्थानों को भ्रष्ट किया है। सर्वश्रेष्ठ एवं क्रोधाग्नि से संतप्त ऐसे मुझे समीप आया हुआ देखकर प्रत्यक्ष यमराज भी भय से मेरे साथ संधि करेगा।
जो विस्तीर्ण अनेक वृक्षों से आच्छादित और युद्ध करने वाले योद्धाओं से युक्त है, ऐसा वह अरण्य अत्यंत पराक्रम से युक्त तुम सब को भी भयमुक्त करता है उस अत्यंत दुर्गम अरण्य को तत्काल समतल कर दूंगा ऐसा उन हितकर्ता लोगों को बोलकर वह दुर्मति शीघ्रता से निकल गया।
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