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शिवभारतम् • अध्याय 19 • श्लोक 31
योगीव विजिताहारविहारो विजितासनः। यः सर्वस्यापि लोकस्य वेत्त्यहो गुप्तमाशयम् ।। उत्प्लुत्य पर्वतशिरः प्राकाराभ्यन्तरस्थितान्। निहन्ति यो जिह्मगतीन् परान् पतगराडिव ।। यस्य यातमविज्ञातं भवत्यमितयोजनम्। अवैति मनसैवाप्तं द्विषन्तमपि यो जनम्।। भवतापकृता पूर्व भवतापकृता स्वयम्। विधत्ते तुलजादेवी सततं यत्सहायताम् ।। तेन विद्विषतानेकसैन्ययुक्तेन पालिताम्। कथं त्वं तामरण्यानीमभिमानी गमिष्यसि ।।
जिसने योगी के समान अपने आहार-विहार को एवं अपने आसन को जीता है एवं जो संपूर्ण संसार के गुप्त अभिप्राय को जानता है। जिस प्रकार गरुड़ सांप के फणों को काटता है उसी प्रकार जो किले के मस्तक पर छलांग मारकर प्रकार में स्थित शत्रु का विनाश करता है। जो मित्र कौन है एवं शत्रु कौन है? यह मन से ही जानता है, लोगों को प्रेरित करने वाले हमारे द्वारा अपमान की गई तुलजा देवी जिसको सदा सहयोग करती है एवं जो अनेक सैन्यों से युक्त है ऐसे शत्रु के द्वारा रक्षित विशाल अरण्य में अभिमानी हम किस प्रकार प्रवेश कर सकते हैं।
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