जिसने योगी के समान अपने आहार-विहार को एवं अपने आसन को जीता है एवं जो संपूर्ण संसार के गुप्त अभिप्राय को जानता है। जिस प्रकार गरुड़ सांप के फणों को काटता है उसी प्रकार जो किले के मस्तक पर छलांग मारकर प्रकार में स्थित शत्रु का विनाश करता है। जो मित्र कौन है एवं शत्रु कौन है? यह मन से ही जानता है, लोगों को प्रेरित करने वाले हमारे द्वारा अपमान की गई तुलजा देवी जिसको सदा सहयोग करती है एवं जो अनेक सैन्यों से युक्त है ऐसे शत्रु के द्वारा रक्षित विशाल अरण्य में अभिमानी हम किस प्रकार प्रवेश कर सकते हैं।
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