इत्याकर्ण्य वचस्तेषां स विद्वेषान्धमानसः। प्रोवाच ताननादृत्य दृप्तः शोणविलोचनः ॥
इस प्रकार उसके वचनों को सुनकर देश भाव से अंधत्व को प्राप्त हुआ एवं क्रोध की लालिमा से युक्त आखों वाला वह उन्मतता से युक्त उसका धिक्कार करके बोला।
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