येन कौमारमारभ्य धन्विना धूर्जटिं विना। स्वप्नेऽपि स्वामिनेऽन्यस्मै न निजं नामितं शिरः ॥ बाल्यात्प्रभृति लोकेऽस्मिन् अनल्पबलशालिनः। कर्माण्यमानुषस्येव प्रायो यस्येह शुश्रुम।। विगायति च यो लोके यवनानां विलोकनम्। निजधर्मधुरीणोऽद्धा शृणोति च न तद्वचः ।। स आह्वयति तत्रैव भवन्तमभयो यदि। तर्हि मन्यामहे तस्य विद्यते साहसं हृदि ।।
जिस धनुर्धारी ने बचपन से ही शंकर के अतिरिक्त अन्य किसी भी स्वामी के सामने अपना सिर सपने में अभी तक नहीं झुकाया है, जिस महाबलशाली पुरुष के अमानवीय कृत्यों को बचपन से ही हम प्रायः सुनते आए हैं, जो यवनों के मुख्य दर्शन को भी अत्यधिक निंदनीय समझता है और जो स्वधर्म में धुरंधर है ऐसा वह यवनों की बातों को बोलता ही नहीं सुनता है तो यदि वह निर्भयता से हमको वहीं पर बुला रहा है तो उसके हृदय में किसी प्रकार का साहस है ऐसा मुझे लगता है।
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