मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
शिवभारतम् • अध्याय 19 • श्लोक 36
या युष्मानतिविक्रमानपि भिया संयोजयन्ती तता। नैकानोकहसंवृता प्रतिभटैर्युध्यद्भिरप्यन्विता ।। तामेतामटवीमतीवविषमां सद्यः करिष्ये समाम्। व्याहृत्येऽतिहितान् हितान् कुमतिना तेन प्रतस्थेतमाम्।। इत्यनुपुराणे सूर्यवंशे कवीन्द्रपरमानन्दप्रकाशितायां शतसाहस्त्र्यां संहितायां अफजलप्रयाणं नाम एकोनविंशोऽध्यायः ।।
जो विस्तीर्ण अनेक वृक्षों से आच्छादित और युद्ध करने वाले योद्धाओं से युक्त है, ऐसा वह अरण्य अत्यंत पराक्रम से युक्त तुम सब को भी भयमुक्त करता है उस अत्यंत दुर्गम अरण्य को तत्काल समतल कर दूंगा ऐसा उन हितकर्ता लोगों को बोलकर वह दुर्मति शीघ्रता से निकल गया।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
शिवभारतम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

शिवभारतम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें