वैराटस्थोऽपि सुतरां योजनत्रयसान्तराम्। जयवल्लीं स यवनः स्वहस्तस्थामवागमत्।।
उस यवन को विराट (वाई) में स्थित होकर तीन योजन अंतर पर स्थित जयवल्ली हाथ में आ गई ऐसा प्रतीत होने लगा।
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