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अध्याय 5 — योगावृत्तिप्रशंसन

गणेशगीता
27 श्लोक • केवल अनुवाद
श्रीगणेशजी बोले - हे राजन्! जो श्रुति और स्मृति में कहे हुए कर्मों को फल की इच्छा न करके करता है, वह योगी कर्म का त्याग करने वाले योगियों से श्रेष्ठ है।
हे महाभुज! मेरे मत में योगप्राप्ति के निमित्त कर्म ही कारण है, योगसिद्धि की सिद्धि के निमित्त शम और दम ही कारण हैं।
इन्द्रियों के विषयों का संकल्पकर कर्म करने वाला अपना शत्रु होता है और जो इनकी इच्छा न कर कर्म करता है, वही योगी सिद्धि को प्राप्त होता है।
एकमात्र आत्मा ही आत्मा का मित्र और शत्रु है, यही ज्ञान होने से उद्धार करता है और यही अज्ञान होने से बन्धन में डालता है, दूसरा कोई नहीं।
मान, अपमान, सुख, दुःख, बन्धु, साधु, मित्र, अमित्र, उदासीन, द्वेषी, मिट्टी के ढेले और सुवर्ण इत्यादि में
समान बुद्धि रखने वाला, जितेन्द्रिय, विज्ञानी, जितात्मा सदा योग का अभ्यास करता रहे, जब तक कि उसको योग की सिद्धि न हो जाय।
जो संतप्त हो, श्रान्त हो, व्याकुल, क्षुधित अथवा व्यग्रचित्त हो, वह योगाभ्यास न करे। अतिशीतकाल अथवा अति उष्णकाल, अग्नि, वायु और जल की अधिकता वाले देश में,
जिस स्थान में ध्वनि अधिक हो, जो टूटा-फूटा हो, गोष्ठ, अग्नि के निकट, जल के निकट, कूप के निकट, श्मशान, नदी, दीवार के निकट तथा जहाँ शुष्क पर्ण का शब्द सुनायी पड़ता हो,
चैत्य वृक्ष के नीचे, वल्मीक (बाँबी) वाले स्थान में और पिशाचादि से युक्त स्थान में योगध्यानपरायण योगी योगाभ्यास न करे।
स्मृति का लोप होना, गूँगापन, बधिरता, मन्दता, ज्वर, जड़ता - ये सब दोष अज्ञान से योगी को होते हैं।
योगाभ्यासी को ये सब दोषपूर्ण स्थान त्याग देने चाहिये, ऐसा न करने से अवश्य स्मृतिलोप आदि दोष होते हैं (अतः उपर्युक्त स्थानों में योगसाधन न करे)।
हे राजन्! योगी सदा थोड़ा भोजन करे, बिना भोजन किये भी न रहे, न बहुत सोये, न बहुत जागे - इस प्रकार सदा योगाभ्यास करने से सिद्धि को प्राप्त हो जाता है।
सम्पूर्ण इच्छा और कामनाओं का त्याग करे, थोड़ा भोजन करे, जागरणशील हो, बुद्धि से सब इन्द्रियों को वश में करके शनैः शनैः शान्ति को प्राप्त हो।
जिस-जिस स्थान में मन जाय, उस-उस स्थान से उसे खींचे और धैर्य से उसे अपने वश में करे, क्योंकि वह महाचंचल है।
योगी सदा इस प्रकार करने से परम शान्ति को प्राप्त होता है और वह संसार में अपनी आत्मा को और अपनी आत्मा में संसार को देखता है।
योग से जो मुझको प्राप्त होता है, उसको मैं आदरपूर्वक प्राप्त होता हूँ और जो मुझे नहीं छोड़ता है, उसको मैं नहीं छोड़ता हूँ तथा संसार से मुक्त कर देता हूँ।
सुख-दुःख, द्वेष, क्षुधा, सन्तोष और तृषा - इनमें जो आत्मा के समान सब प्राणियों को देखता है, जो मुझ सर्वव्यापी को जानता है और
जो केवल मुझमें संलग्न है, वह जीवन्मुक्त है और वह त्रिलोकी में ब्रह्मादिक देवताओं द्वारा नमस्कार करने योग्य है।
वरेण्य बोले - हे भगवन्! इन दोनों प्रकार के योगों को मैं महाकठिन देखता हूँ, कारण कि मन बड़ा दुष्ट और चंचल है तथा इसका निग्रह करना कठिन है।
श्रीगणेशजी बोले - (हे राजन्!) जो निग्रह करने में कठिन इस मन का नियमन करता है, वह घटीयन्त्र के समान घूमने वाले इस संसारचक्र से मुक्त हो जाता है।
विषयरूपी अरोंसे यह दृढ़ चक्र बना हुआ है और कर्मरूपी कीलों से अच्छी प्रकार जड़ा हुआ है, इस कारण साधारण मनुष्य इसके छेदन करने में समर्थ नहीं होते।
अतिशय दुःख, वैराग्य, भोग में तृष्णा का त्याग, गुरु की कृपा, सत्संग - ये इस (मन) के जीतने के उपाय हैं।
योगसिद्धि के निमत्त अभ्यास से मन को अपने वश में करे, हे वरेण्य! बिना मन के जीते योग महाकठिन है।
वरेण्य बोले - हे भगवन्! योगभ्रष्ट को किस लोक की प्राप्ति होती है, उसकी क्या गति होती है और क्या फल होता है? हे सर्वज्ञ! हे बुद्धिरूपी चक्र को धारण करने वाले! मेरे इस सन्देह का छेदन कीजिये।
श्रीगणेशजी बोले - (हे राजन्!) योगभ्रष्ट पुरुष दिव्य देह धारण कर स्वर्ग में जाते हैं, वहाँ उत्तम सुख भोगकर पुनः शुद्ध योगियों के कुल में जन्म लेते हैं।
और फिर पूर्व जन्मों के संस्कार से यह योगी होता है। कोई भी पुण्यकर्म करने वाला नरक को नहीं जाता।
हे राजन्! ज्ञाननिष्ठा से, तप की निष्ठा से अथवा कर्मनिष्ठा से जो मुझमें भक्ति करता है, वह अत्यन्त श्रेष्ठ योगी है।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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