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गणेशगीता • अध्याय 5 • श्लोक 24
वरेण्य उवाच- योगभ्रष्टस्य को लोकः का गतिः किं फलं भवेत् । विभो सर्वज्ञ मे छिन्धि संशयं बुद्धिचक्रभृत् ॥
वरेण्य बोले - हे भगवन्! योगभ्रष्ट को किस लोक की प्राप्ति होती है, उसकी क्या गति होती है और क्या फल होता है? हे सर्वज्ञ! हे बुद्धिरूपी चक्र को धारण करने वाले! मेरे इस सन्देह का छेदन कीजिये।
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