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गणेशगीता • अध्याय 5 • श्लोक 3
इन्द्रियार्थांश्च संकल्प्य कुर्वन्स्वस्य रिपुर्भवेत् । एताननिच्छन्यः कुर्वन्सिद्धिं योगी स सिद्ध्यति ॥
इन्द्रियों के विषयों का संकल्पकर कर्म करने वाला अपना शत्रु होता है और जो इनकी इच्छा न कर कर्म करता है, वही योगी सिद्धि को प्राप्त होता है।
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