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गणेशगीता • अध्याय 5 • श्लोक 26
पुनर्योगी भवत्येष संस्कारात्पूर्वकर्मजात् । न हि पुण्यकृतां कश्चिन्नरकं प्रतिपद्यते ॥
और फिर पूर्व जन्मों के संस्कार से यह योगी होता है। कोई भी पुण्यकर्म करने वाला नरक को नहीं जाता।
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