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गणेशगीता • अध्याय 5 • श्लोक 27
ज्ञाननिष्ठात्तपोनिष्ठात्कर्मनिष्ठान्नराधिप । श्रेष्ठो योगी श्रेष्ठतमो भक्तिमान्मयि तेषु यः ॥ इति श्रीगणेशपुराणे गजाननवरेण्यसंवादे गणेशगीतायां योगवृत्तिप्रशंसनं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥
हे राजन्! ज्ञाननिष्ठा से, तप की निष्ठा से अथवा कर्मनिष्ठा से जो मुझमें भक्ति करता है, वह अत्यन्त श्रेष्ठ योगी है।
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